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Category Archives: किसान शिक्षा

इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ने केंद्र द्वारा गन्ना किसानों को सब्सिडी दिए जाने के फैसले का स्वागत किया है| इस बीच मौजूदा सत्र के लिए प्रति टन के हिसाब से 55 रुपए प्रति टन की दर से 1550-1600 करोड़ रुपए दिए जाएंगे| यह सब्सिडी गन्ना के एफआरपी में 11% की बढ़ोतरी के दौरान किसानों को दिए जाने वाले भुगतान में कुछ हिस्सा बनकर चीनी उद्योग की मुश्किल कम कर सकती है|  इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल अविनाश वर्मा ने सरकार के इस निर्णय की सराहना की है| अविनाश वर्मा के मुताबिक - यह सब्सिडी मौजूदा सत्र में हो रहे नुकसान की भरपाई कर पाने के लिए काफी नहीं होगी| लेकिन फिर भी यह फैसला कुछ हद तक राहत जरूर पहुंचाएगा| यह सब्सिडी सरकार की तरफ से उठाया गया एक सकारात्मक कदम है| किसान एवं उद्योग की परेशानियों को खत्म करने के फलस्वरुप सरकार द्वारा लिया गया पहला कदम है जो कि वर्तमान परिस्थितियों में चीनी उद्योग एवं किसानों को फायदा देने के मद्देनजर उठाया गया है| सरकार को किसानों को मौजूद कठिन परिस्थितियों से उबरने की और कदम उठाने होंगे| गौरतलब है कि गन्ना मूल्य में वृद्धि एवं बंपर उत्पादन के चलते चीनी का भाव बाजार में चीनी मिलों को घाटा हो रहा है| इस बीच गन्ना बकाया काफी बढ़ गया है| और किसानों को भुगतान कर पाने में मिलो को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है|

गन्ना किसानों की सब्सिडी के फैसले को लेकर खु...

May 11, 2018
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ने केंद्र द्वारा गन्ना किसानों को सब्सिडी दिए जाने के फैसले का स्वागत किया है| इस बीच मौ [more]
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प्याज मुख्य रूप से सब्जी की प्रमुख फसल है| और कभी-कभी प्याज कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाता है| जिससे किसानों को ज्यादा मुनाफा नहीं मिल पाता है| किसानों को उनके प्याज की सही कीमत मिले| इसके लिए राजविंदर सिंह राणा ने एक नई तकनीक ईजाद की है| राजविंदर पंजाब के लुधियाना जिले के मदियानी गांव में रहते हैं| उन्होंने देखा कि कई बार जब प्याज हल्का सड़ने लगता है| तो किसानों को उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है| राजविंदर ने समस्या का हल निकालने के लिए इस विषय पर शोध किया है| उन्होंने 'एग ट्रे’ में प्याज रखकर सप्ताह में दो बार पानी का छिड़काव किया| इसके बाद उससे हरी पत्ती वाला प्याज निकलने लगा| राजविंदर बताते हैं कि 1 किलो प्याज में जितने गुण पाए जाते हैं, उतने ही गुण 1 हरे पत्ते वाले प्याज में पाए जाते हैं| वैसे तो इस तकनीक का इस्तेमाल हम उस समय कर सकते हैं| जब हमारे पास मिट्टी का कोई साधन ना हो| लेकिन अभी मैंने इसका इस्तेमाल अपनी किचन में किया है| इस प्याज का इस्तेमाल हम रोजाना कर सकते है| ये वर्षों चलने वाली प्रक्रिया है| इससे हमारे घर में हल्का खराब हो रहा प्याज प्रयोग में आ जाएगा|  राजविंदर आगे बताते हैं कि इस प्रक्रिया में किसानों के प्याज का उन्हें सही दाम भी मिलेगा| साथ ही अगर कोई इस हरे प्याज को बाजार में बेचना चाहेगा| तो उस समय बाजार भाव के हिसाब से 40-60 रुपए आसानी से कमाए जा सकते हैं| आप भी अपनी रसोई में खाली 'एग ट्रे' में घर में हल्की खराब हो रहे प्याज को एग ट्रे के खानों में भरकर रख सकते हैं| सप्ताह में दो बार हल्के पानी का इसमें छिड़काव करें| इसमें हर सप्ताह में 2 बार पानी को डालते रहें| जिससे यह हरा बना रहेगा| इस तकनीक से घर में खराब हो रहे प्याज का सही से प्रयोग कर सकते हैं|

करिए कुछ ऐसा उपाय की, सड़ा प्याज भी देगा अधि...

May 04, 2018
प्याज मुख्य रूप से सब्जी की प्रमुख फसल है| और कभी-कभी प्याज कौड़ियों के दाम पर बिकने को मजबूर हो जाता है| जिससे किस [more]
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गोबर से बने उपलों का उपयोग विभिन्न मांगलिक कार्यों में किया ही जाता है| यही वजह है कि ऑनलाइन बाजार में इसकी काफी मांग बढ़ी है| गाय के गोबर से लेकर उससे बना उपला जिसे गोइठा और कंडा भी कहते हैं| ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर अपनी जगह बना चुका है| ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स इन कंडों को भी शानदार पैकिंग मे करके होम डिलीवरी करा रही है| www.ebay.com , www.shopclues.com , www.gaukranti.org , Amazon.com  आदि कई साइट्स पर कंडे बिक रहे हैं| जहां आर्डर करने पर कुछ ही दिनों में उसकी डिलीवरी हो जाएगी|  यही नहीं ग्राहकों की सहूलियत के लिए कई साइट्स पर इन उपलों के आकार और वजन का भी ब्यौरा मौजूद है| इन साइट्स पर एक दर्जन उपलों का मूल्य 100 से लेकर 300 रुपये तक है| दो दर्जन मंगवाने पर डिस्काउंट दिया जा रहा है| त्यौहारी मौसम में इन उपलों पर कई डिस्काउंट ऑफर भी दिए जाते हैं| यहां आपको उपलों की कीमत भले ही थोड़ी ज्यादा लगे| लेकिन इसके आध्यात्मिक इस्तेमाल को देखते हुए यह कीमत कुछ भी नहीं है| धार्मिक कार्यों में गाय के गोबर से स्थान को पवित्र किया जाता है| गाय के गोबर से बने उपले से हवन कुंड की अग्नि जलाई जाती है| आज भी गांव में महिलाएं सुबह उठकर गाय के गोबर से घर के मुख्य द्वार को लीपती है| इंटरनेट पर आपको ऐसी कई वेबसाइट्स मिल जाएंगे जो सिर्फ गौ-उत्पाद, आपके द्वार तक पहुंचाने की सुविधा देती है| इन्हीं में से एक है,   www.gaukranti.org  इस साइट पर आपको गाय का गोबर और उससे बने उपले, साबुन, भगवान की मूर्तियां, ऑर्गेनिक पेंट, हवन के लिए धूप के अलावा परिष्कृत गोमूत्र भी उपलब्ध है| यह कंपनी अपना कच्चा माल गुजरात से लेकर भोपाल तक की लगभग 15 गौशालाओं से मंगवाती है| गाय के गोबर के उपलों का व्यापार और वैश्विक आकार ले चुका है| और खुदरा विक्रेताओं के पास इसकी डिलीवरी के लिए बड़े पैमाने पर आर्डर आ रहे हैं| तेजी से शहरी होती जा रही देश की आबादी के लिए अब यह सब दुर्लभ होता जा रहा है| यही वजह है कि देश और देश के बाहर खास अवसरों पर इन उपलों की मांग बढ़ रही है| इसलिए आप भी इसका बिजनेस शुरू कर सकते हैं| अगर आप गांव में रहते हैं तो आपको गोबर भी आसानी से मिल जाएगा| गोबर को ऑनलाइन बेचने के लिए आप या तो अपनी खुद की वेबसाइट जैसे - www.gaukranti.org बना सकते हैं| या फिर जो पॉपुलर वेबसाइट हैं जैसे कि www.ebay.com  , www.shopclues.com , Amazon.com  आदि वेबसाइट हैं| वहां पर सेलर बन कर बेच सकते हैं| सेलर बनने के लिए हर वेबसाइट की अलग-अलग डिमांड है, जिसे आप आसानी से पूरा कर सकते हैं| यह बात अलग है कि ये उपले बाजार में या आपके पड़ोस में ग्वाले से मिलने वाली उपलों से महंगी कीमत पर मिलेंगे| अपनी असली कीमत से करीब 5 गुना ज्यादा दाम पर मिलने वाले ऑनलाइन गोबर के कंडे ग्राहकों से ज्यादा ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के लिए फायदे का सौदा है| इनसे आपको काफी मुनाफा हो सकता है| आदि आते हैं वहां पर सेलर बंद कर भेज सकते हैं शेर बनने के लिए हर वेबसाइट की अलग-अलग डिमांड है जिससे आप आसानी से पूरा कर सकते हैं यह बात अलग है कि यह प्ले बाजार में या आपके पड़ोस में ग्वालियर से मिलने वाली उपयोग से महंगी कीमत पर मिलेंगे अपनी असली कीमत से करीब 5 गुना ज्यादा दाम पर मिलने वाले ऑनलाइन गोबर के कंडे ग्राहकों से ज्यादा ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट के लिए फायदे का सौदा है इनसे आपको काफी मुनाफा हो सकता है

अब गाय के गोबर को बेचिए ऑनलाइन और बन जाइए लख...

May 03, 2018
गोबर से बने उपलों का उपयोग विभिन्न मांगलिक कार्यों में किया ही जाता है| यही वजह है कि ऑनलाइन बाजार में इसकी काफी मा [more]
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मक्का की एक नई किस्म इलाहाबाद स्थित सैम हिगिनबॉटम कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक शैलेश मार्कर ने विकसित की है| यह शैट्स मक्का-2 किस्म अन्य किस्मों के मुकाबले अधिक उपज देगी| इस सफेद बीज वाली किस्म को विकसित करने के लिए वैज्ञानिक शैलेश ने मेक्सिको अंतर्राष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र से जर्मप्लास्म मंगवाया था| यह किस्म 85-90 के मध्य तैयार होने वाली किस्म है, जो की प्रति हेक्टेयर 35-40 क्विंटल की उपज देती है| साथ ही कई मक्का में होने वाली कुछ पत्ती झुलसा रोगों के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं| इसके किस्म के बारे में वैज्ञानिक शैलेश का मानना है कि यह लगातार तीन-चार साल तक उपयोग किया जा सकता है| जबकि इसका सफेद आटा होने के कारण से गेहूं के आटे में मिला सकते हैं| जिससे कई प्रकार के उत्पाद बनाए जा सकेंगे| इसके अतिरिक्त प्रोफेसर शैलेश का मानना है कि इसका हरा चारा भी पशुओं के लिए उपयोग में ला सकते हैं| इस अनुसंधान के लिए उन्हें संस्थान के कुलपति प्रोफेसर बि. लाल एवं निदेशक शोध प्रोफेसर एस. बि. लाल से मदद मिली| जिन्होंने उन्हें इस अनुसंधान के लिए प्रेरित किया| उत्तर प्रदेश कृषि विभाग ने इसे पूरे प्रदेश में विभिन्न जगहों पर लगातार तीन साल तक प्रयोग किया| इस दौरान यह सिद्ध की जा सकी| इसके बाद अब इसे किसानों को बुवाई के लिए स्वीकृति दे दी गई है|

हर कसौटी पर खरी, मक्का की नई किस्म, कृषि विभ...

May 02, 2018
मक्का की एक नई किस्म इलाहाबाद स्थित सैम हिगिनबॉटम कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक शैलेश मार्कर ने विकसित की है| यह [more]
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अरंडी के बीजों पर हाल में एक नया प्रयोग किया गया| विशेषज्ञों के मुताबिक इस प्रयोग के बाद अरंडी का उत्पादन 2 गुना बढ़ जाएगा| उत्पादन बढ़ाने के लिए आपको ना खेती का तरीका बदलना पड़ेगा और ना ही ज्यादा पैसा लगाना होगा| सरदार कृषि नगर दातीवाडा कृषि विश्वविद्यालय (एसडीएयू), पालनपुर के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित उच्च उपज की जीसीएच-7 किस्म ने किसानों की आमदनी का मार्ग खोल दिया है| अगर परंपरागत तरीके से अरंडी की खेती की जाए तो प्रति हेक्टेयर 2 टन से अधिक उत्पादन नहीं मिल पाता है| लेकिन इस तरीके से खेती करने पर अरंडी के पैदावार प्रति हेक्टेयर 4 टन तक बढ़ जाती है| जीसीएच-7 किस्म विपरीत जलवायु स्थिति को झेलने में सक्षम है| कीटों का हमला एक दूसरी समस्या है| और एसडीएयू ऐसे बीजों के विकास के लिए काम कर रहा है, जो इनके प्रति भी प्रतिरोधक क्षमता वाला हो|  इस प्रयोग को इस्तेमाल करने के बाद गुजरात समेत तेलंगाना, राजस्थान तथा अन्य अरंडी उत्पादक दूसरे बड़े राज्यों को भी बहुत मुनाफा होगा| सबसे खास बात यह है कि यहां के किसानों के जीवन में भी एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा| भारत अरंडी तेल और अरंडी खली की वैश्विक मांग के करीब 90% की आपूर्ति करता है| विदेशों से मांग में लगातार बढ़ोतरी हुई है| अरंडी तेल का उपयोग फार्मास्युटिकल्स और विमानन (एक ईंधन के तौर पर किया जाता है, क्योंकि यह शून्य से 40 डिग्री के नीचे तापमान पर भी नहीं जमता है) सहित विभिन्न उद्योगों में किया जाता है| अरंडी की मांग वैश्विक स्तर पर अधिक होने के कारण अगर इसका उत्पादन अधिक हुआ तो भी इसकी कीमत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा|

अरंडी की यह किस्म देगी, प्रति हेक्टेयर 4 टन ...

May 02, 2018
अरंडी के बीजों पर हाल में एक नया प्रयोग किया गया| विशेषज्ञों के मुताबिक इस प्रयोग के बाद अरंडी का उत्पादन 2 गुना बढ [more]
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प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्टअप योजना के तहत केरल सिवा पुरम के सेंट थॉमस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने खेती-बाड़ी के कई कामों को एक साथ अंजाम देने वाली ऐसी अद्भुत मशीन तैयार की है| जो किसानों के लिए और खेती बाड़ी के क्षेत्र में वरदान साबित हो सकती है| साथ ही साथ यह कृषि से संबंधित आने वाले खर्च में कमी लाएगी| छात्रों ने इस मशीन को "मन्नीरा" नाम दिया है| "मन्नीरा" एक साथ जुताई, रोपाई, सिंचाई, कटाई, सूप, पिसाई यह सारे काम कर सकती है| इस मशीन को बनाने का एकमात्र मकसद लागत को कम करके मुनाफा डबल करना है| और हमें उम्मीद है कि यह मशीन कृषि क्षेत्र में एक क्रांति लाएगी| जब 10 एकड़ की जमीन पर 5 साल के अंतराल में यही सारे कार्य अलग-अलग मशीनों द्वारा किए किए गए| तो लागत लगभग 27,08,500 रुपए रही, वही "मन्नीरा" का उपयोग किया तो यह लागत गिरकर 6,20,500 आ गई| इस मशीन को बड़ी उपलब्धि बताते हुए छात्रों ने कहा कि अगर अंतिम निरीक्षण के बाद इसका चयन हो जाता है| तो हमें 2 लाख का अनुदान मिलेगा| गौर करने वाली बात यह है कि इस मशीन को बनाने की कीमत भी 2 लाख रूपये की ही है|

आ गया एक ऐसा मशीन जो जुताई से लेकर पिसाई तक ...

Apr 30, 2018
प्रधानमंत्री मोदी के स्टार्टअप योजना के तहत केरल सिवा पुरम के सेंट थॉमस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने खेती-बाड [more]
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शिलांग - मेघालय सरकार ने राज्य में उगाई जाने वाली लकाडोंग हल्दी का उत्पादन 5 गुना बढ़ाने के लिए एक अभियान की शुरुआत की है| सरकार ने अगले 5 सालों में इसका उत्पादन कम से कम 50 हजार मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रखा है| मिशन लकाडोंग के एक दस्तावेज के मुताबिक, अगले 5 साल में वर्तमान 2,577 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को बढ़ाकर 6,070 हेक्टेयर करने की योजना है| भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन के मुताबिक, जैनतिया पर्वतीय जिला दुनिया में बेहतरीन किस्मों की हल्दी के उत्पादन के लिए मशहूर है| और उच्च करक्यूमिन वाली लकाडोंग हल्दी सबसे मशहूर किस्मों में से एक है। मिशन लकाडोंग का शुभारंभ करते हुए राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कहा है कि - "लास्कीन और थाडलास्कीन प्रखंडों में करीब 25 हजार हेक्टेयर में कम से कम 1  हजार किसान इस समय लकाडोंग हल्दी की खेती के काम में लगे हुए हैं| और 1 साल में करीब 10 हजार मीट्रिक टन उत्पादन किया जा रहा है|" उन्होंने कहा, "इतना उत्पादन हमारे लकाडोंग प्रजाति के लिए वैश्विक छाप छोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है| लकाडोंग हल्दी के उत्पादन में वृद्धि के लिए कम से कम 50 हजार मीट्रिक टन तक और खेती के क्षेत्र को दोगुना करने के लिए अभियान चलाने की जरूरत है|"

जैविक हल्दी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए, म...

Apr 28, 2018
शिलांग – मेघालय सरकार ने राज्य में उगाई जाने वाली लकाडोंग हल्दी का उत्पादन 5 गुना बढ़ाने के लिए एक अभियान की [more]
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लखनऊ - केंद्र व प्रदेश सरकार किसानों को नई-नई तकनीकी और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए पूरे देश में किसान कल्याण कार्यशाला आयोजित करने जा रही है| 2 मई को देश के सभी ब्लॉक मुख्यालयों पर इस कार्यशाला का आयोजन होगा| किसानों की आय दोगुनी करने के लिए केंद्र व प्रदेश सरकार ने ग्राम स्वराज अभियान के तहत इस कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है| इसमें पशुपालन विभाग, दुग्ध उत्पादन, मत्स्य व मधुमक्खी पालन के अलावा कृषि से जुड़े सभी विभाग अपनी लाभकारी योजनाओं की जानकारी किसानों को देंगे| इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्रों पर तैनात कृषि वैज्ञानिक भी कार्यशाला में मौजूद रहकर किसानों को तकनीकी और एकीकृत खेती के बारे में बताएंगे| आईवीआरआई के प्रसार शिक्षा विभाग में प्रधान वैज्ञानिक डॉक्टर महेश चंद्र बताते हैं की - "सरकार किसान और वैज्ञानिकों को एक साथ लाने के लिए प्रयास कर रही है| इसलिए ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन लगातार किया जा रहा है|" इसमें वैज्ञानिक किसानों को नई तकनीकों, जिनसे उन्हें ज्यादा से ज्यादा लाभ हो इसके बारे में मदद कर सकेंगे|

2 मई को देश के सभी ब्लॉक मुख्यालयों में होगी...

Apr 27, 2018
लखनऊ – केंद्र व प्रदेश सरकार किसानों को नई-नई तकनीकी और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए पूरे द [more]
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विशुनपुर (बाराबंकी) - अब गांव के लोगों को गेहूं लेकर गांव से दूर जाने जाने की जरूरत नहीं होगी| बदलते दौर में अब आटा पीसने की मशीन घर पर पहुंच रही है| जिसके चलते जहां लोगों को काफी सुविधा हुई वही समय की भी बचत हो रही है| यह मशीन बिहार नगर के अर्जुन ने बनाई है| अर्जुन बताते हैं कि - "आटा पीसने की मशीन ट्रैक्टर से चलती है| यह मशीन लगभग 75 हजार की आती है| ट्रैक्टर मिलाकर इस कार्य को करने के लिए 5 से 6 रुपए लाख का खर्चा आ जाता है| गांव-गांव आटा पीसने के लिए निकल जाते हैं| गांव में जो गेहूं पिसवाने बुलाता है, उसके दरवाजे पर जाकर गेहूं की पिसाई करते हैं|" और आगे बताते हैं कि - "मशीन की मदद से 1 घंटे में लगभग ढाई कुंटल गेहूं की पिसाई हो जाती है| इसके लिए हम 1 रुपए प्रति किलो की दर से मूल्य लेते हैं| व 20 किलो पर एक किलो आटे के रूप में जलन (एक किलो आटा रख लिया जाता है) ली जाती है। सहालक के समय अच्छा काम निकलता है।" जिला मुख्यालय से लगभग 22 किमी दूर सालेहनगर के ग्रामीण प्रदीप पाल बताते हैं कि - "घर-घर आटा पीसने वाली मशीन आने से हमें बहुत फायदा हुआ| क्योंकि पहले घर में आटा खत्म होने से काफी पहले ही हमें आटा पिसवाने के लिए समय निकालना पड़ता था| लेकिन अब घर की महिलाएं ही यह काम कर लेती हैं|

अब घर-घर पहुंचती है, गेहूं पीसने की पोर्टेबल...

Apr 26, 2018
विशुनपुर (बाराबंकी) – अब गांव के लोगों को गेहूं लेकर गांव से दूर जाने जाने की जरूरत नहीं होगी| बदलते दौर में [more]
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लखनऊ  - भारत में आज भी ऐसे कई गांव हैं, जहां बिजली अब तक नहीं पहुंच सकी है| गांव में लोग आज भी लालटेन और दीए की रोशनी में जीवन का गुजर-बसर कर रहे हैं| इन गांवों के लोगों ने वर्षों से अपने गांव में बिजली की रोशनी तक नहीं देखी है| मगर केरल के रहने वाले दो भाइयों ने एक ऐसा अविष्कार किया है| जिससे गांव-गांव में बहुत ही कम लागत में न सिर्फ बिजली पहुंच सकेगी, बल्कि गांव के लोग जिंदगी भर तक अपने घर को रोशन रख सकेंगे| तो आइए आज आपको बताते हैं कि केरल के इन दोनों भाइयों के आविष्कार के बारे में - भारत जैसे देश के लिए बहुत उपयोगी खोज असल में, केरल के रहने वाले अवंत गद्दे इनोवेंशस के संस्थापक अरुण और अनूप जॉर्ज ने बेहद कम लागत में एक ऐसी पवनचक्की विकसित है| जिससे बिजली उत्पन्न की जा सकती है| कमाल कि बात यह है कि इस पवन चक्की के जरिये न सिर्फ आपके पूरे घर को बिजली मिल सकेगी, बल्कि इस पवन चक्की से जिंदगी भर आपके घर को रोशनी मिल सकती है। ऐसे में यह खोज भारत जैसे देश के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती है। यह पवन चक्की एक पंखे के साइज के बराबर है| और इस पवन चक्की की कीमत 750 अमेरिकी डॉलर यानी मात्र  50 हजार रुपए तक है यानी इस उपकरण को लेने के लिए आपको मात्र 50 हजार रुपए की धनराशि खर्च करनी होगी| असल में यह पवनचक्की रोजाना 3 से 5 किलोवाट प्रति घंटा बिजली पैदा करती है| एक तरह से देखा जाए तो जीवन भर की बिजली के लिए यह कीमत भी बहुत ज्यादा नहीं है| दोनों भाइयों का कहना है कि इससे पारिस्थितिक संतुलन पर भी असर नहीं पड़ेगा| हम देश के बिजली संकट को को दूर करना चाहते हैं एक अंग्रेजी वेबसाइट के साक्षात्कार के दौरान दोनों भाइयों ने बताया कि हम देश के बिजली संकट को दूर करना चाहते हैं| हमारा लक्ष्य ऊर्जा गरीबी को खत्म करने के साथ संघर्ष कर रहे राज्यों के पावरग्रिड पर निर्भरता को कम करना और जरूरतमंदों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है| इसलिए अंतर रखता है महत्व अरुण जार्जिस की माने तो जब एक छोटी पवन चक्की 1 किलो वाट ऊर्जा उत्पन्न करती है तो इसका खर्च करीब 3 से 7 लाख रुपये आता है| मगर इस पवन चक्की को लेने के लिए आपको सिर्फ 50 हजार रुपए की धनराशि खर्च करनी होगी| ऐसे में निश्चित रूप से जीवन भर आप को बिजली देने के लिए इस उपकरण की कीमत ज्यादा नहीं है| फिलहाल यह पवन चक्की बाजार में अभी लॉन्च नहीं की गई है| लेकिन बहुत ही जल्दी से मार्केट में लांच किए जाने की उम्मीद की जा रही है| केरल के इन दोनों भाइयों की खोज पर अगर सरकार अमल करती है| तो पूरे देश को बिजली मिल सकती है| फिलहाल सरकार इस दिशा में अभी विचार कर रही है| क्या है भारत की स्थिति ग्लोबल विंड एनर्जी काउंसिल की मानें तो भारत वैश्विक पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के मामले में चीन, अमेरिका और जर्मनी के बाद चौथे स्थान पर आता है।

दो भाइयों ने मिलकर कर दिया कमाल का आविष्कार,...

Apr 25, 2018
लखनऊ  – भारत में आज भी ऐसे कई गांव हैं, जहां बिजली अब तक नहीं पहुंच सकी है| गांव में लोग आज भी लालटेन और दीए [more]
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नॉर्थ बंगाल के कूच बिहार जिले की एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों एक बेहद खास किस्म की अदरक तैयार की है|जिसकी पैदावार आम अदरक से दोगुनी ज्यादा होती है और इसकी महक भी बाकी अदरक से अलग है| वैज्ञानिकों ने इस अदरक का नाम "मोहिनी" रखा है| बंगाल तथा अन्य जगहों पर इसकी टेस्टिंग के बाद Union कृषि विभाग ने मोहिनी अदरक का नोटिफिकेशन निकाला था| आपको बता दें एक दशक से भी ज्यादा समय तक शोध के बाद इस अदरक को तैयार किया गया है| इस अदरक को तैयार करने वाले वैज्ञानिक सोमेंद्र चक्रवर्ती के मुताबिक इस अदरक में रोग बहुत कम लगते हैं| उनके मुताबिक "मोहिनी अदरक"  अन्य पारंपरिक अदरकों के मुकाबले लगभग 2 गुना अधिक पैदा होती है| जहां अन्य अदरक एक हेक्टेयर में 6 से 10 टन की उपज देती है| वही मोहिनी के पैदावार 14 टन होती है| उन्होंने बताया कि मोहिनी अदरक को इंटरनेशनल जर्नल्स ऑफ साइंस एनवायरमेंट और टेक्नोलॉजी में जगह दी गई है| गौरतलब है कि 70% अदरक का उत्पादन केरल में होता है| अदरक की खेती असम, बंगाल, सिक्किम, आंध्र प्रदेश और हिमाचल में भी होती है|

आ गई अदरक की नई किस्म, पुराने अदरक के मुकाबल...

Apr 23, 2018
नॉर्थ बंगाल के कूच बिहार जिले की एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों एक बेहद खास किस्म की अदरक तैयार की है|जिसकी [more]
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किसान भाइयों कृषि, पशुपालन तथा मौसम संबंधित ...

Apr 23, 2018
प्रिय किसान भाईयो कृषि, पशुपालन तथा मौसम सम्बंधित जानकारी के लिए रिलायंस फाउंडेशन के निःशुल्क हेल्पलाइन नंबर 18004198800 पर सोमवार से शनिवार सुबह 09:30 बजे से शाम 07:30 बजे के बीच संपर्क कर सकते हैं| [more]
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