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Category Archives: किसान शिक्षा

किसान भाइयों टमाटर उगाने की एक नई अत्याधुनिक विधि विकसित की गई है| जिससे टमाटर की उपज प्रति वर्ग मीटर में 60 किलो तक प्राप्त की जा सकती है| राजस्थान के बस्सी में ढिढोला फॉर्म पर यह तकनीक अपनाई जाएगी| इस दौरान बताया जा रहा है कि ढिढोला फॉर्म पर सिर्फ पानी के वाष्प से ही टमाटर को उगाया जाएगा| इसके लिए राज्य सरकार भी 13 करोड़ रुपए की सहायता प्रदान करने का दावा कर रही है| फॉर्म के वरिष्ठ योगेश कुमार वर्मा का कहना है कि इस विधि से पानी के वाष्प में पोषक तत्वों को घोलकर पाइपों द्वारा वाष्प छोड़ी जाएगी| जिसे पौधे ग्रहण कर वृद्धि कर सकेंगे| उन्होंने बताया कि इसी वर्ष सितंबर-अक्टूबर में टमाटर उगाना शुरू किया जाएगा| जिसके सफल हो जाने के बाद किसानों को उपलब्ध कराया जाएगा| उल्लेखनीय है कि यह देश में इस तरह का होने वाला प्रथम प्रयोग है|  इस प्रकार दावा किया जा रहा है कि टमाटर उगाने के इस विधि से 11 महीने तक टमाटर की उपज मिलेगी और आने वाले समय में राजस्थान में टमाटर की कमी नहीं होगी| और किसानों को उनकी उपज के बदले सही दाम मिल पाएंगे| इस प्रयोग के लिए भूमि का पहचान कर वहां मिट्टी और पानी की जांच का अध्ययन किया जा चुका है| जिसके फलस्वरुप कार्य शुरू किया जाएगा| इस दौरान संस्थान का मानना है कि जिन किसानों के पास भूमि बहुत सीमित मात्रा में है उन किसानों के लिए टमाटर उगाने की यह विधि काफी कारगर साबित होगी|

इस जगह पर उगेगा टमाटर, वह भी बिना मिट्टी और ...

Apr 21, 2018
किसान भाइयों टमाटर उगाने की एक नई अत्याधुनिक विधि विकसित की गई है| जिससे टमाटर की उपज प्रति वर्ग मीटर में 60 किलो त [more]
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अधिक से अधिक लोग पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहते हैं| कभी आपने यह सुना है की पढ़ाई करने के बाद किसी ने बकरी पालन करना चाहता है| पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे ही दूर भागते हैं| ऐसे में यह बात तो मजाक ही लगेगी| लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने, श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि एनआईएफटी जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट से पढ़ाई की है| और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरी पालन कर रही हैं| श्वेता का सफर 2015 से शुरू होता है| जब वह शादी करके अपने पति के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हुई| वह पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं| बेंगलुरु आने के बाद वह घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थी| बल्कि खुद का कोई काम शुरु करना चाहती थी| एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फॉर्म देखने गईं| वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा| वह खाली समय में अक्सर वहां जाने लगी| धीरे-धीरे फॉर्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरी पालन करने का मन बना लिया था| एक गांव में जन्मी और पली-बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वह अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं| और इसलिए उन्होंने बेंगलुरु शहर की अपनी अच्छी-खासी लाइफस्टाइल को छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानी पोखरी जैसे छोटे से गांव में जाने का फैसला किया| उन्होंने अपने पति से जब यह बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को यह काम करने के लिए स्वीकृति दे दी| श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी उसमें लगा दी| यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया| श्वेता बताती हैं की - "उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे| मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए| मेरा सब कुछ छोड़कर बकरी पालन करने का यह फैसला बिल्कुल गलत है, और गांव में कुछ नहीं रखा है करने को| हर नस्ल की बकरियां है फॉर्म में श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था| वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था| जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे| लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरु कर दिया| इस समय श्वेता के फॉर्म में अलग-अलग प्रजातियों की सौ से  ज्यादा बकरियां पली है| इनमें सिरोही, बरबरी जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के 5 हजार से लेकर 1 लाख तक के बकरे मौजूद है| श्वेता बकरी पालन में पूरी तरह पारंगत हो चुके हैं| बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा मोटा इलाज सब वह खुद ही करती हैं| जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर पर लादकर मंडी ले जाती हैं| श्वेता के फॉर्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है| श्वेता बताती है शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का सहयोग मिलता रहा| पिछले साल का टर्नओवर 25 लाख रुपए का था| अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं|

देश के सर्वश्रेष्ठ इंस्टिट्यूट को छोड़ कर शु...

Apr 20, 2018
अधिक से अधिक लोग पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहते हैं| कभी आपने यह सुना है की पढ़ाई करने के बाद कोई बकरी पालन करना [more]
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अक्सर यह देखा गया है कि किसी भी क्षेत्र की अधूरी जानकारी रखने पर हम उस क्षेत्र में तरक्की नहीं कर पाते हैं| इसलिए पूरी जानकारी का होना बहुत ही अनिवार्य है| किसान भाइयों के लिए राज्य सरकार कई सारी योजनाएं निकालती है| लेकिन उस योजना की जानकारी ना होने के कारण किसान भाई उसका लाभ नहीं उठा पाते हैं| किसानों की खाद, बीज और पानी से लेकर लोन सहित अन्य समस्याओं की सुनवाई टोल फ्री नंबर 18002331850 व 18001801551 पर होगी| किसान मितान केंद्र के लिए सरकार ने यह टोल फ्री नंबर जारी किया है| इसके साथ ही किसानों की समस्या सुनने के लिए कृषि विभाग के अफसरों की जिम्मेदारी भी तय कर दी गई है| विभाग ने बकायदा ड्यूटी पर रहने वाले अफसरों का मोबाइल नंबर जारी किया है| किसान उनके नंबर पर सीधे कॉल कर सकते हैं| और संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं| कृषि विभाग के उप-संचालक ने बताया कि किसान, खेती किसानी के साथ ही राजस्व सहकारिता, ऊर्जा एवं जल संसाधन विभाग से संबंधित जानकारी भी मितान केंद्र के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं| मितान केंद्र में आने वाले किसानों की समस्या गौर से सुनने की नसीहत अफसरों को दी गई है| कहा गया है कि - "उपलब्ध योजनाओं के आधार पर उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए आश्वस्त करते हुए जल्द से जल्द आवश्यक कार्रवाई की जाए| आने वाले किसानों और उनकी समस्याओं का रिकॉर्ड रखने और उनकी समस्याओं की जानकारी संबंधित विभाग के जिला-स्तर के प्रमुख अधिकारी को भेजने के निर्देश दिए गए हैं|" किसान मितान केंद्र के अफसरों के नंबर नोडल अफसर आरके परगनिया सहायक संचालक 98271 04237 बीआर धृतलहरे विकास अधिकारी 90095 39911 बीके टिकरिहा कृषि अधिकारी 93008 34514 बुधवार व गुरुवार पूनम चौहान कृषि विस्तार अधिकारी 97550 42526 आरके साहू कृषि विस्तार अधिकारी 97548 67078 शुक्रवार वीके श्रीवास्तव कृषि विस्तार अधिकारी 83052 25653 कमला गंधर्व कृषि विस्तार अधिकारी 78040 27751 शनिवार हिमाचल मोटघरे व श्री नवनीत मिश्रा 98286 54060 सभी दिन विजय ठाकुर कृषि विस्तार अधिकारी 94064 05551

किसान भाई बीज, खाद और लोन लेने के लिए इस नंब...

Apr 19, 2018
अक्सर यह देखा गया है कि किसी भी क्षेत्र की अधूरी जानकारी रखने पर हम उस क्षेत्र में तरक्की नहीं कर पाते हैं| इसलिए प [more]
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विश्व बैंक ने इस बार भारत की आर्थिक विकास दर बढ़ने का अनुमान लगाया है| इस बीच 7.3% तक बढ़ोतरी का अनुमान है| जबकि 2019 व 2020 तक यह बढ़कर 7.5% तक पहुंचने के आसार हैं| विश्व बैंक ने यह साफ किया है कि भारत में नोटबंदी और जीएसटी से वर्कर विकास दर बढ़ जाएगी| आपको बताते चलें कि यह दर पिछले सत्र में 6.7% थी| जबकि हाल में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार इस साल में वृद्धि की बात कही गई है| इसमें किसी क्षेत्र का भी योगदान उल्लेखनीय रहेगा| क्योंकि सामान्य मानसून के चलते देश में कृषि उत्पादन बढ़ने से विकास दर पर काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा| गौरतलब है कि इस बीच मौसम के पूर्वानुमान के मुताबिक देश में फिर से मानसून समान रहने के आसार हैं| जिससे एक बार फिर से कृषि उत्पादन बढ़ेगा| जाहिर है कि खाद उत्पादन से सकल उत्पादन काफी हद तक निर्भर करता है| ऐसे में हमारे किसान भाइयों के लिए अच्छी खबर है की मानसून की अवधि बढ़ने से उन्हें फायदा होगा| साथ ही देश के सकल उत्पादन में वृद्धि होगी|

विश्व बैंक ने कहा बढ़ेगी भारत की आर्थिक विका...

Apr 19, 2018
विश्व बैंक ने इस बार भारत की आर्थिक विकास दर बढ़ने का अनुमान लगाया है| इस बीच 7.3% तक बढ़ोतरी का अनुमान है| जबकि 20 [more]
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हमेशा से अफवाह चलती आ रही है कि अंडा शाकाहारी होता है या मांसाहारी, इस बात का शायद कोई अंत नहीं है| लेकिन मेरठ के सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय में अनोखी रिसर्च चल रही है| यह रिसर्च आयुर्वेदिक अंडों को लेकर है| आयुर्वेदिक अंडों के उत्पादन की ओर कदम बढ़ाते हुए मेरठ की कृषि यूनिवर्सिटी ने संभावनाओं के कई द्वार खोले है| दावा है कि जहां ये अंडा अधिक स्वास्थ्यवर्धक होगा| वही किसानों की आय को दुगना कर के सरकार के अभियान को भी मजबूती देगा| विश्वविद्यालय कुक्कुट अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र के प्रभारी डॉक्टर डीके सिंह का कहना है कि इस अंडे को आयुर्वेदिक अंडा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इस प्रक्रिया में मुर्गियों का जो आहार दिया जाता है, उसमें आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का मिश्रण होता है| सामान्य रूप से मुर्गियों का अंडा सफेद होता है| लेकिन इस प्रक्रिया में तैयार अंडा गुलाबीपन लिए हुए रहता है| मुर्गी का बाकायदा आहार चार्ट रहता है| जिसमें अनाज जैसे - मक्का, बाजरा, दाल की बजरी सहित जड़ी-बूटियों के मिश्रण का उपयोग होता है| मुर्गियों के आहार में कुल 15 तरीके की जड़ी-बूटियों का मिश्रण किया जाता है| इसमें सफेद मूसली, सतावर, कोंच, गोंद, शालब पंजा आदि शामिल है| हल्दी और लहसुन भी मुर्गियों को खिलाई जाती है| डॉक्टर डीके सिंह का कहना है कि आयुर्वेदिक अंडा किसानों की आय को दोगुना करने में अच्छा साधन बन सकता है|  प्रधानमंत्री का किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य भी इससे प्राप्त होगा| आमतौर पर मुर्गियों को दिए जाने वाले आहार में केमिकल युक्त उच्च प्रोटीन वाला आहार होता है| मुर्गियां कीड़े-मकोड़े भी खा लेती हैं| मुर्गियों को एंटीबायोटिक भी दी जाती है| ये एंटीबायोटिक मनुष्य में प्रतिरोधक क्षमता कम रखता है| मुर्गियों को स्ट्रॉयड के इंजेक्शन भी लगते हैं| ये अंडे मनुष्य के स्वास्थ्य पर कु-प्रभाव डालते हैं| आयुर्वेदिक अंडा प्राप्त करने की दिशा में ऐसी किसी चीज का उपयोग नहीं होता है| जो कि मनुष्य के स्वास्थ्य पर कु-प्रभाव न डालें| दक्षिण भारत के कुछ शहरों में आयुर्वेदिक अंडों का प्रयोग हुआ है| लेकिन नार्थ इंडिया में यह पहला अवसर है| जब अधिक अंडे पर सर्च हो रही है| आयुर्वेदिक अंडे की कीमत 23 से 24 रुपए तक हो सकती है| जबकि विश्वविद्यालय की हेचरी में से 12 से 15 रुपए में तैयार कर लिया जाएगा| आयुर्वेदिक अंडे में ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है| जो मछलियों में पाया जाता है| यह मस्तिष्क और हृदय को भी स्वस्थ रखता है| एनीमिया और कुपोषण के शिकार से भी आयुर्वेदिक अंडा बचाएगा| आयुर्वेदिक अंडे से हड्डियां मजबूत होती हैं| और कैंसर की भी आशंका कम रहती है|

लो आ गया किसानों की आमदनी बढ़ाने वाला आयुर्व...

Apr 18, 2018
हमेशा से अफवाह चलती आ रही है कि अंडा शाकाहारी होता है या मांसाहारी, इस बात का शायद कोई अंत नहीं है| लेकिन मेरठ के स [more]
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पुराने जमाने में बुजुर्ग लोग कहा करते थे कि - "एक वक्त ऐसा आएगा इंसान सब काम एक ही स्थान पर बैठे हुए करेगा, बुजुर्गों की पुरानी कहावतें आज सच होती जा रही हैं| तकनीक ने इतनी तेजी से संसार को जकड़ा है कि हर एक काम आसान हो गया है|" पहले किसान खेत को सींचने के लिए दो-दो दिन खेत में रहा करते थे| ताकि उसका खेत पूरी तरह से सींच जाए| लेकिन अब किसान अपने घर बैठे आसानी से सिर्फ एक यंत्र के जरिए खेत की सिंचाई कर सकता है| जी हां यह संभव है| ओस्सियन एग्रो कंपनी नैनो गणेश के नाम से किसानों के लिए एक उत्पाद उपलब्ध करा रही हैं| इस उपकरण के माध्यम से किसान आसानी से घर बैठे अपने समबर्सिबल चला सकता है| यानी कि जब किसान को खेत में सिंचाई की जरूरत पड़े तो घर पर बैठे हुए समबर्सिबल को चालू कर सकता है, और बंद कर सकता है| इस ऑटोमेटिक स्विच को मोबाइल से कनेक्ट कर दिया जाता है| तो किसान आसानी से मोटर को फोन के माध्यम से ओंन और ऑफ दोनों कर सकता है| यहां तक कि यदि किसान को लग रहा है कि मोटर में कोई प्रॉब्लम है तो उसको आसानी से इस यंत्र के माध्यम से अलर्ट मिल जाता है| यह एक बहुत ही अत्याधुनिक यंत्र है| इससे किसान काफी फायदा ले रहा है| मशीन संबंधी जानकारी के लिए संपर्क करें: मिस्टर जयन 022-24234477 022-24472277

किसानों को मिला सबसे बड़ी टेंशन से छुटकारा, ...

Apr 17, 2018
पुराने जमाने में बुजुर्ग लोग कहा करते थे कि – “एक वक्त ऐसा आएगा इंसान सब काम एक ही स्थान पर बैठे हुए कर [more]
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राजस्थान के युवक महेंद्र सिंह दाहिमा ने महाविद्यालय की नौकरी छोड़कर बागवानी कर अधिक लाभ कमाया| वह अपने ग्रीन हाउस से वार्षिक सात से आठ लाख रूपय कमा लेते हैं| उन्होंने ग्रीन हाउस से खेती का कार्य वर्ष 2015 से शुरू किया था| इस बीच उन्होंने अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर ली है| अन्य युवक उनको एक उदाहरण के तौर पर देखते हैं| ग्रीन हाउस में टमाटर, शिमला मिर्च व खीरा आदि की खेती करते हैं| उल्लेखनीय है कि वह अपने पिता के सेवाकाल के दौरान ग्रीन हाउस में रुचि रखते थे| जिस से प्रेरित होकर उन्होंने महाविद्यालय की सेवा छोड़कर खेती करना शुरू की| ग्रीन हाउस की हाईटेक खेती कर वह दो पालीहाउस व नेट सेट के जरिए आज सफल किसान के तौर पर अच्छी आमदनी हासिल कर रहे हैं| वह सीजन के अनुरूप खेती करते हैं| उगाई गई सब्जियों को वह आसपास के शहरी इलाकों में बेचते हैं| जाहिर है कि शहरी इलाकों के आसपास वहां सब्जी की अच्छी मांग है| इस दौरान वह सब्जी की सीजनल खेती से युवाओं को प्रशिक्षण भी दे रहे हैं| यही नहीं किसानों को भी वह पालीहाउस के अंतर्गत किसानी के गुर सिखाते हैं| लेकिन युवाओं को खेती में रूचि बढ़ाने के लिए वह उन्हें ग्रीनहाउस का मॉडल के अनुसार प्रशिक्षित करते हैं|

नौकरी से नहीं खेती से मिली है पहचान और बन गए...

Apr 16, 2018
राजस्थान के युवक महेंद्र सिंह दाहिमा ने महाविद्यालय की नौकरी छोड़कर बागवानी कर अधिक लाभ कमाया| वह अपने ग्रीन हाउस स [more]
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माना जाता है कि परवल की खेती गंगा के किनारे ही होती है| झारखंड की मिट्टी और जलवायु परवल के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती| पर इस धारणा को नकारते हुए गोला के हेसापोड़ा पंचायत के भुभूई गांव की शांति देवी ने परवल की खेती कर समाज को यह बता दिया कि अगर लग्न व जज्बा हो तो कोई काम असंभव नहीं है| शांति ने पहली बार 2 वर्ष पूर्व 1 एकड़ जमीन में परवल लगाया था| जिससे अच्छी पैदावार हुई| आज साल में 4 बार इसे तोड़ कर बाजार में बेचती हैं| जिससे करीब एक लाख बीस हजार रुपए की आमदनी हो जाती है| एक बार में करीब 40 किलो परवल निकलता है| शांति ने बताया कि - "उसने यह खेती प्रदान नामक संस्था के सहयोग से किया था| अब उसके परिवार का जीविकोपार्जन बड़े आराम से हो जाता है|" परवल की खेती से होता है परिवार का जीविकोपार्जन- शांति देवी के परवल की खेती से गांव के लोग इतने प्रभावित हुए कि अब परवल उगाने लग गए हैं| गांव के मोहन महतो और प्यासो देवी ने उसका अनुसरण करते हुए परवल की खेती शुरू की और आज इसी से अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं| गोला के बनता मार्केट में भेजती हैं फसल- शांति देवी साल में 4 बार परवल की फसल तोड़ती हैं| इस बार अप्रैल-माह के समाप्त होने के बाद इसे तोड़ा जाएगा और गोला के बनतारा मार्केट ला कर बेचा जाता है| यहां परवल के अच्छे दाम मिल जाते हैं| लोगों का स्थानीय परवल काफी पसंद आ रहे हैं| शांति का परवल हाथो-हाथ बिक जाता है| महीने में दो बार देनी पड़ती है खाद और दवा- किसान शांति ने बताया कि - "वे एक बार अपने रिश्तेदार के यहां रांची गई थी| वही उसने छोटे पैमाने पर परवल की खेती देखि| यहीं से वह स्वयं सेवी संस्था प्रदान से जुड़ गई| और इसे लगाने के तरीके सीखे|" शांति ने बताया कि पौधा रोपने के समय से ही महीने में दो बार खाद और कीटनाशक दवाइयां डाली जाती हैं| साथ ही पौधों की सुरक्षा और बराबर देखभाल करना होता है| शांति को मिलेगा प्रशासनिक सहयोग : कृषि पदाधिकारी इस संबंध में जिला कृषि पदाधिकारी अशोक सम्राट ने बताया कि उनकी जानकारी में मात्र एक ही जगह परवल की खेती होने की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली है| अगर ऐसा हो रहा है तो वह अपने प्रयास से वैश्य किसान को लिफ्ट इरीगेशन की सुविधा मुहैया करा सकते हैं| और साथ ही अप्रैल माह में इसका सर्वे कराकर किसान को लाभ दिया जाएगा|gaonguru.com

झारखंड की मिट्टी में परवल की खेती से लाखों क...

Apr 13, 2018
माना जाता है कि परवल की खेती गंगा के किनारे ही होती है| झारखंड की मिट्टी और जलवायु परवल के लिए उपयुक्त नहीं मानी जा [more]
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भारत एक कृषि प्रधान देश है| यहां भिन्न-भिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं| जिनमें सब्जी वर्ग की फसलों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है| सब्जी उत्पादन में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है| सब्जी वर्ग की फसलों में देखा जाए तो टमाटर अपनी अहम भूमिका निभाता है| उत्पादन की दृष्टि से टमाटर एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है| जो कि सब्जी व फल दोनों प्रकार से काम में आता है| अगर पाला नहीं पड़े तो टमाटर की फसल वर्षभर उगाई जा सकती है| टमाटर मैं मुख्य रूप से विटामिन ए व सी पाया जाता है| इसका उपयोग ताजे फल के रूप में या उन्हें पकाकर डिब्बाबंदी करके अचार, चटनी, सूप बनाकर व अन्य सब्जियों के साथ पकाकर भी किया जा सकता है| टमाटर की फसल में कई प्रकार के कीड़ों का आक्रमण होता है| जिनकी सही समय का पहचान करके प्रबंधन किया जाए तो वाकई किसान भाइयों को लाभ मिलेगा| टमाटर में लगने वाले कीट निम्न प्रकार हैं- नर्सरी में पौधों को कीड़ों के प्रकोप से बचाने के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. एक मिलीलीटर तथा साथ में जाइनेब या मैन्कोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोलकर छिड़काव करें| सफेद लट: यह कीट टमाटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है| इस कीट की लटें पौधे की जड़ों को खाती हैं| इसके प्रकोप से पौधा सूख कर मर जाता है| प्रबंधन: बुवाई वाले खेत में फसल चक्र अपनाना चाहिए| वयस्क कीट प्रकाश प्रपंच के ऊपर भारी संख्या में आकर्षित होते हैं| अतः इसका प्रयोग करना चाहिए| इस कीट के वयस्क पेड़ पौधों पर भारी संख्या में बैठे रहते हैं| जिनको हाथ या किसी लकड़ी से छलका कर उन्हें इकट्ठा करके जमीन में दबा दें या फिर केरोसीन युक्त पानी में डालकर मार दें| इस कीट के नियंत्रण हेतु फोरेट 10 जी 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई से पूर्व कतारों में पौधों की जड़ों के पास डालें| फल छेदक: इस कीट का वयस्क भूरे रंग का तथा लट हरे रंग की होती हैं| इस कीट की सबसे हानिकारक अवस्था ही लट होती है| लट शुरू में मुलायम पत्तों पर हमला करती है| तथा बाद में फलों पर आक्रमण करती है| एक लट 2-8 फल नष्ट करने में सक्षम होती है| ऐसे फल उपभोक्ताओं द्वारा पसंद नहीं किए जाते हैं| बाजार में अच्छे भाव भी नहीं मिलते हैं| फल पर किए गए छेद गोल होते हैं| आक्रमण हरे फलों पर अधिक होता है| जिससे अम्लता बढ़ जाती है| और ये फल धीरे-धीरे कम पसंद किए जाते हैं| प्रबंधन: 40 दिन पुराने अमेरिकी लंबा गेंदा और 25 दिन पुरानी टमाटर की पौध को 1:16 के अनुपात में पंक्तियों में एक साथ बोयें| मादा पतंगे अण्डे देने के लिए गेंदे की ओर आकर्षित होती है| प्रकाश जाल की स्थापना से वयस्क पतंगों को मारने के लिए आकर्षित किया जा सकता है| इस कीट संबंधित फेरोमोन ट्रेप एक हेक्टेयर में 12 लगाने चाहिए| क्षतिग्रस्त फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए| प्रारंभिक दौर लार्वा को मारने के लिए 5%  नीम के बीज गिरी के तेल का छिड़काव करें| प्रति हेक्टेयर (‘टी’ आकार के) 15-20 पक्षियों के बैठने के लिए रखना चाहिए| जो कीट भक्षी पक्षियों को आमंत्रित करने में मदद करता है| फल छेदक से संरक्षण के लिए एन.पी.वी. 250 एल.ई./ हेक्टेयर के साथ-साथ 20 ग्राम / लीटर गुड़ का  10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव भी लाभदायक होता हैं| मैलाथियान 50 cc एक मिली मीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए| सफेद मक्खी: एक छोटा सा सफेद रंग का कीट होता है| इसके प्रोढ़ व निम्फ दोनों ही पौधे का रस चुसकर नुकसान करते हैं| इसके द्वारा अर्क चूसने और संयंत्र पोषक तत्वों को हटाने के कारण पौधे कमजोर हो जाते हैं| अगर पौधों के आसपास पानी भरा हुआ है तो नुकसान और अधिग गंभीर भी हो सकता है| सफेद मक्खी बायोटाइप 'बी' टमाटर पत्ती कर्ल वायरस के संक्रमण और संचालित होने से फसल को पूर्णरूप से नुकसान होने का खतरा हो जाता है| प्रबंधन: वयस्क को आकर्षित करने के लिए एक हेक्टेयर में 12 पीले रंग के येलो कार्ड लगाने चाहिए| सफेद मक्खी पत्ती कर्ल वायरस के प्रचार करने में वेक्टर के रूप में कार्य करती हैं| सभी प्रभावित पौधों को आगे प्रसार से बचाने के लिए उखाड़ कर निकाल देना चाहिए| नीम की निंबोली या पत्तियों से तैयार 5% नीम के अर्क का छिड़काव करें| 7 पत्ती युक्त बना जीवामृत का छिड़काव करें| आक, धतुरा, नीम, करंज आदि की पत्तियों से तैयार वनस्पति काढे का छिड़काव करें| एसीफेट 75 एस.पी. 2 ग्राम या ऐसीटामिप्रिड 20 एस.पी. 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें| माहू: यह नरम शरीर नाशपाती के आकार का पंखों वाला या पंखहीन कीट होता है| झुंड में रहकर रस चुसना, मलिनकिरण या पत्ते को मोड़ना तथा शहद्नुमा पदार्थ छोड़ना इसकी पहचान होती है| प्रबंधन: वयस्क को आकर्षित करने के लिए एक हेक्टेयर में कम से कम 12 पीले रंग के येलो कार्ड लगाने चाहिए| नीम की निंबोली या पत्तियों से तैयार 5% नीम के अर्क का छिड़काव करें| 7 पत्ती युक्त बना जीवामृत का छिड़काव करें| आक, धतुरा, नीम, करंज आदि की पत्तियों से तैयार वनस्पति काढे का छिड़काव करें| डाइमेथोएट 30 ई.सी. एक मिली या थायामिथोक्जाम 25 डब्ल्यू.जी. 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए| हरा तेला: यह हरे रंग का नरम शरीर वाला हेलीकॉप्टर के आकार का कीट होता है| यह पत्ती की निचली सतह पर रहता है तथा हमेशा टेढ़ा चलता है| प्रबंधन: नीम की निंबोली या पत्तियों से तैयार 5% नीम के अर्क का छिड़काव करें| 7 पत्ती युक्त बना जीवामृत का छिड़काव करें| आक, धतुरा, नीम, करंज आदि की पत्तियों से तैयार वनस्पति काढे का छिड़काव करें| थायामिथोक्जाम 25 डब्ल्यू.जी. 0.4 ग्राम या या डाइमेथोएट 30 ई सी 1 मिली /लीटर की दर से छिड़काव करना चाहिए| ऐसीफेट 75 एस.पी. 2 ग्राम या ऐसीटामिप्रिड 20 एस.पी. 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए| सुत्रकृमी: इसकी वजह से टमाटर की जड़ों में गांठ पड़ जाती है| तथा पौधों की बढ़वार रुक जाती है जिससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है| प्रबंधन: रोपाई से पूर्व 25 किलो कार्बोफ्यूरान 3G प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलाएं या पौधे की रोपाई के समय जड़ों के पास 8-10 कण डालकर रोपाई करें| gaonguru.com

टमाटर को विभिन्न कीटों से बचाने के लिए करें ...

Apr 12, 2018
भारत एक कृषि प्रधान देश है| यहां भिन्न-भिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं| जिनमें सब्जी वर्ग की फसलों का भी महत्वप [more]
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भारत में स्ट्राबेरी की खेती सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश से कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में 1960 के दशक से शुरू हुई| परंतु उपयुक्त किस्मों की अनुपलब्धता तथा तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती में अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी | आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में तकनीकी ज्ञान, परिवहन शीत भंडार और प्रसंस्करण व परिरक्षण की जानकारी होने से स्ट्रॉबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है | बहुउद्देशीय कंपनियों के आ जाने से स्ट्रॉबेरी के विशेष संसाधित पदार्थ जैसे जैम, पेय, कैंडी  इत्यादि बनाए जाने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है| जलवायु: भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती शीतोष्ण क्षेत्र में सफलता पूर्वक की जा सकती है | मैदानी क्षेत्रों में सिर्फ सर्दियों में ही इसकी एक फसल ली जा सकती है | पौधे अक्टूबर-नवंबर में लगाए जाते है, जिन्हें शीतोष्ण क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है | यहां फल फरवरी-मार्च में तैयार हो जाते हैं भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र शिमला में किए गए शोध यह सिद्ध करते हैं कि दिसंबर से फरवरी माह तक स्ट्रॉबेरी की क्यारियां प्लास्टिक सीट से ढँक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं | और उपज भी 20% अधिक हो जाती है | अधिक वायु वेग वाले स्थान इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है | इन स्थानों पर वायु रोधक प्रावधान होना चाहिए | भूमि का चुनाव तथा खेत की तैयारी: इसकी खेती हल्की रेतीली से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है | परंतु दोमट मिट्टी इसके लिए विशेष उपयुक्त होती है | रेतीली भूमि में जहां पर्याप्त सिंचाई के साधन उपलब्ध हो, इसकी खेती की जा सकती है | अधिक लवण युक्त तथा अपर्याप्त जल निकास वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है | हल चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है | सतह से 15 सेमी उठी हुई क्यारियों में इसकी खेती अच्छे ढंग से की जा सकती है | पहाड़ी ढलानों में सीढ़ी नुमा खेतो में क्यारियां 60 सेमी चौड़ी तथा खेत की लंबाई स्थिति अनुसार तैयार की जाती है | सामान्यतया 150 सेमी लंबे तथा 60 सेमी चौड़ी क्यारी में 10 पौधे रोपे जाते हैं | खाद तथा उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार पर निर्भर है | ऐसी क्यारियों में अच्छी तरह गली-सड़ी 5-10 किलोग्राम गोबर की खाद और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण - कैन, सुपर फास्फेट और म्यूरेट आफ पोटाश 2:2:1 के अनुपात में देने की सिफारिश की जाती है | यह मिश्रण वर्ष में दो बार, मार्च तथा अगस्त माह में दिया जाता है | मैदानी क्षेत्र में इसकी खेती 60-75 सेमी चौड़ाई वाली लंबी क्यारियाँ बना कर, जिसमें 2 क्यारियाँ लगाई जा सके | या मेढ़े बनाकर उसी प्रकार की जा सकती है, जिस प्रकार टमाटर या अन्य सब्जियां उगाई जा सकती हैं | पौधे लगाने की विधि: पहाड़ी क्षेत्र में पौधे अगस्त-सितंबर तथा मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवंबर तक लगाए जाते हैं | पौधे किसी प्रमाणित व विश्वस्त नर्सरी से ही लिए जाने चाहिए | जिससे इसकी जाति की जानकारी मिले और रोग-रहित भी हो | पौधे लगाने से पहले पुराने पत्ते निकाल दिए जाने चाहिए | और एक दो नए उगने वाले पत्ते ही रखना चाहिए | मिट्टी से होने वाले रोगों से बचने के लिए पौधों की जड़ों को 1% बोर्डो मिश्रण या कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.2 %) या डाइथेन एम 45 (0.2 प्रतिशत) के घोल में 10 मिनट तक उपचारित करके छाया में हल्का सुखा लेना चाहिए | क्यारियों में कतार से कतार तथा पौधों से पौधे का अंतर 30 सेमी रखा जाता है | पौधा लगाने के समय क्यारियों में लगभग 15 सेमी गहरा छोटा गड्ढा बनाकर पौधा लगाकर उपचारित जड़ों के इर्द-गिर्द को अच्छी तरह दबा दिया जाता है | ताकि जड़ों तथा मिट्टी के बीच वायु ना रहे | पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई आवश्यक है | उन्नत किस्में: उन्नत किस्मों में मुख्य ट्योगा, टोरे, एन आर राउंड हैड, रैड कोट, कंटराई स्वीट आदि है, जो सामान्यतया छोटे आकार के फल देती हैं | इनमें अच्छा आकार टोरे तथा एन आर राउंड हैड का ही है | जिसके फल का वजन 4-5 ग्राम होता है| आजकल बड़े आकार वाली जातियां देश में आयात की जा रही हैं | जिनमें चाँडलर कनफ्यूचरा, डागलस, गारौला, पजारों, फर्न, ऐडी, सैलवा, ब्राईटन, बेलरूबी, दाना तथा ईटना आदि प्रमुख है । स्ट्रॉबेरी की उपज इसकी जाति और जलवायु पर निर्भर करती है सम्मानित है | सामान्यतया इसके उपज 200-500 ग्राम प्रति पौधा मिल जाती है | यद्यपि विदेशों में अधिकतम 900-1000 ग्राम प्रति पौधा ली जा चुकी है | सिंचाई और देखभाल: स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़े गहरी होती हैं, इसलिए जड़ों के निकट नमी की कमी से पौधों को क्षति हो सकती है | और पौधे मर भी सकते हैं | सिंचाई की थोड़ी सी कमी से भी फलों के आकार और गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है | स्ट्रॉबेरी की फसल को बार-बार परंतु हल्की सिंचाई चाहिए | सामान्य परिस्थितियों में शरद ऋतु में 10-15 दिन तथा ग्रीष्म में 5-7 दिन के अंतराल में सिंचाई आवश्यक है | ड्रिप (बूंद-बूंद) सिंचाई विधि विशेष लाभप्रद है | सिंचाई की मात्रा मिट्टी की अवस्था तथा खेत कि ढलानों पर निर्भर रहती है | स्ट्रॉबेरी की क्यारियों को सूखी घास या काले रंग की प्लास्टिक की चादर से ढकने के विशेष लाभ है | सूखी घास की मोटाई 5-7 सेमी आवश्यक है | विभिन्न अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित किया गया है कि इस विधि द्वारा मिट्टी में अच्छी नमी रहती है | खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं | पाले के कुप्रभावों को भी कम करती है | और फलों का सड़ना कम हो जाता है | पकने वाले फलों को सुखी घास से ढँकने से पक्षियों द्वारा नुकसान भी कम होता है | ओलावृष्टि प्रभावित क्षेत्रों में क्यारी के ऊपर ओलारोधक जालों का प्रयोग किया जा सकता है | जिस पौधे से फल लेने हो उनमें से रन्नज काट देना चाहिए | अन्यथा भरपूर फसल नहीं भी आ सकती है | और फलों का आकार भी छोटा रह जाता है | जिसका प्रभाव विक्रय मूल्य पर पड़ता है स्ट्रॉबेरी का पौधा पहले वर्ष से ही फल देने लग जाता है | शीतोष्ण क्षेत्र में एक पौधे की लाभप्रद फसल 3 वर्ष तक ली जा सकती है | परंतु सबसे अधिक उपज 2 वर्ष की आयु का पौधा देता है | कृषक अपने खेतों में स्ट्रॉबेरी इस क्रम में लगाएं ताकि अधिक से अधिक क्यारियाँ 2 या 3 वर्ष की आयु के पौधों की हो, और 3 वर्ष से अधिक आयु वाली क्यारियों में पुनः पौधारोपण कर दे | कीट व रोग नियंत्रण: स्ट्रॉबेरी की खेती को कई कीट व रोग क्षति पहुंचाते हैं | कीटो में तेला, माइट, कटवर्म तथा सूत्रकृमि प्रमुख है | डीमैथोयेट, डिमैटोन, फौरेट का प्रयोग इन्हें नियंत्रण में रखता है | फलों पर भूरा फफूंद रोग तथा पत्तों पर धब्बों वाले रोगों का नियंत्रण डायाथयोकार्बामेट पर आधारित फफूंदनाशक रसायनों के छिड़काव से किया जा सकता है | फल लग जाने के बाद किसी भी फफूंद व कीटनाशक रसायनों का छिड़काव नहीं करना चाहिए | यदि किन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों में करना भी पड़े तो छिड़काव विशेष सावधानी से किया जाना चाहिए | 3 वर्ष तक स्ट्रॉबेरी की खेती करने के बाद खेत को कम से कम 1 वर्ष तक खाली रखने या गेहूं, सरसों, मक्का, तथा दलहन फसलों का चक्र अपनाने से कीट सूत्रकृमि तथा अन्य रोगों का प्रकोप कम हो जाता है | तुड़ाई: मार्च से मई तथा मैदानी क्षेत्रों में फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च माह तक फल पकने शुरू हो जाते हैं | पकने के समय फलों का रंग हरे से लाल रंग में बदलना शुरू हो जाता है | फल का आधे से अधिक भाग का लाल रंग होना, तुड़ाई की उचित समय को बताता है | फलों की तुड़ाई विशेष सावधानी तथा कम गहरी टोकरियों से ही करनी चाहिए | रोगी व छतिग्रस्त फलों की छँटनी अवश्य करनी चाहिए | फल तोड़ने के तुरंत बाद 2 घंटे शीत भंडारण करने से फलों की भंडारण अवधि बढ़ जाती है |

किसान भाई इसकी खेती करने से आप हो जाएंगे माल...

Apr 11, 2018
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पिछले बीती हुई रात में अन्नदाताओं पर जमकर 'आफत' बरसी | बरसात और ओलावृष्टि के कारण किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फिर गया | कई जगहों पर नुकसान इतना है कि कृषि विभाग ने तुरंत प्रभाव से अधिकारियों को आदेश दिए हैं | बीती रात फतेहाबाद में भी तेज हवाओं के साथ बरसात हुई | और जिले में कई जगहों पर ओलावृष्टि के कारण गेहूं की फसल चौपट हो गई  तेज हवाओं के साथ हुई बरसात और ओलावृष्टि के कारण फसलों के नुकसान के बारे में जिला फतेहाबाद के कृषि उपनिदेशक डॉक्टर बलवंत सहारण ने बताया कि जिले में बरसात तो इतनी ज्यादा नहीं हुई है | लेकिन तेज हवाओं के कारण खेती में खड़ी फसल बिछ गई है जिसके कारण फसल में नुकसान हुआ है | डॉक्टर सहारण ने बताया कि तेज हवाओं के अलावा जिले में कई जगह पर ओलावृष्टि हुई | जिसके कारण गेहूं की फसल बर्बाद हो गई | डॉक्टर सहारण ने बताया कि बीती रात तेज हवाओं और ओलावृष्टि के कारण फसलों में नुकसान के आकलन के लिए उन्होंने खंड स्तर पर सभी टीमों को निर्देश जारी कर दिए हैं | और फसल में नुकसान के आकलन के लिए सभी टीम गांव पहुंच रही है | उन्होंने कहा की मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक आगामी 2 दिनों में मौसम बिल्कुल साफ बना रहेगा | जिसके कारण नुकसान में कमी की संभावना है | वही कृषि विभाग के उप निदेशक ने किसानों से अपील की है कि किसान भी तुरंत अपने नजदीकी कृषि अधिकारी से संपर्क कर अपनी फसल का नुकसान का आकलन करवाएं | ताकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसान को उसकी फसल के नुकसान की भरपाई करवाई जा सके | डॉ बलवंत सहारण ने बताया कि अगले 2 दिन में कृषि विभाग द्वारा और फसल बीमा कंपनियों के अधिकारियों द्वारा जिले में बरसात, तेज हवा और ओलावृष्टि के कारण फसलों में नुकसान का आकलन कर लिया जाएगा और इसकी रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेज दी जाएगी |

बारिश ने किया फसल को बर्बाद, किसान हुए निराश...

Apr 10, 2018
पिछले बीती हुई रात में अन्नदाताओं पर जमकर ‘आफत’ बरसी| बरसात और ओलावृष्टि के कारण किसानों की महीनों की म [more]
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किसान भाइयों जानिए कौन सी फसल किस महीने में लगाएं कि हो ज्यादा फायदा- गांव गुरु

किसान भाइयों जानिए कौन-सी फसल किस महीने में ...

Apr 09, 2018
 किसी भी फसल की अच्छी पैदावार करने के लिए जरूरी होता है कि अच्छी फसल की जानकारी हो| तथा साथ ही साथ कौन-सी फसल किस म [more]
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