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देश के सर्वश्रेष्ठ इंस्टिट्यूट को छोड़ कर शुरू किया बकरी पालन, और अब कमाती है लाखों में – गांव गुरु

अधिक से अधिक लोग पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहते हैं| कभी आपने यह सुना है की पढ़ाई करने के बाद कोई बकरी पालन करना चाहता है| आप तो जानते ही हैं कि पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे ही दूर भागते हैं| ऐसे में यह बात तो मजाक ही लगेगी| लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने, श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि एनआईएफटी जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट से पढ़ाई की है| और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरी पालन कर रही हैं|

श्वेता का सफर 2015 से शुरू होता है| जब वह शादी करके अपने पति के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हुई| वह पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं| बेंगलुरु आने के बाद वह घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थी| बल्कि खुद का कोई काम शुरु करना चाहती थी|

एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फॉर्म देखने गईं| वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा| वह खाली समय में अक्सर वहां जाने लगी| धीरे-धीरे फॉर्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरी पालन करने का मन बना लिया था|

अधिक से अधिक लोग पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहते हैं| कभी आपने यह सुना है की पढ़ाई करने के बाद किसी ने बकरी पालन करना चाहता है| पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे ही दूर भागते हैं| ऐसे में यह बात तो मजाक ही लगेगी| लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने, श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि एनआईएफटी जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट से पढ़ाई की है| और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरी पालन कर रही हैं| श्वेता का सफर 2015 से शुरू होता है| जब वह शादी करके अपने पति के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हुई| वह पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं| बेंगलुरु आने के बाद वह घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थी| बल्कि खुद का कोई काम शुरु करना चाहती थी| एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फॉर्म देखने गईं| वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा| वह खाली समय में अक्सर वहां जाने लगी| धीरे-धीरे फॉर्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरी पालन करने का मन बना लिया था| एक गांव में जन्मी और पली-बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वह अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं| और इसलिए उन्होंने बेंगलुरु शहर की अपनी अच्छी-खासी लाइफस्टाइल को छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानी पोखरी जैसे छोटे से गांव में जाने का फैसला किया| उन्होंने अपने पति से जब यह बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को यह काम करने के लिए स्वीकृति दे दी| श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी उसमें लगा दी| यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया| श्वेता बताती हैं की - "उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे| मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए| मेरा सब कुछ छोड़कर बकरी पालन करने का यह फैसला बिल्कुल गलत है, और गांव में कुछ नहीं रखा है करने को| हर नस्ल की बकरियां है फॉर्म में श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था| वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था| जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे| लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरु कर दिया| इस समय श्वेता के फॉर्म में अलग-अलग प्रजातियों की सौ से  ज्यादा बकरियां पली है| इनमें सिरोही, बरबरी जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के 5 हजार से लेकर 1 लाख तक के बकरे मौजूद है| श्वेता बकरी पालन में पूरी तरह पारंगत हो चुके हैं| बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा मोटा इलाज सब वह खुद ही करती हैं| जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर पर लादकर मंडी ले जाती हैं| श्वेता के फॉर्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है| श्वेता बताती है शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का सहयोग मिलता रहा| पिछले साल का टर्नओवर 25 लाख रुपए का था| अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं|

देश के सर्वश्रेष्ठ इंस्टिट्यूट को छोड़ कर शुरू किया बकरी पालन, और अब कमाती है लाखों में

एक गांव में जन्मी और पली-बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वह अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं| और इसलिए उन्होंने बेंगलुरु शहर की अपनी अच्छी-खासी लाइफस्टाइल को छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानी पोखरी जैसे छोटे से गांव में जाने का फैसला किया|

उन्होंने अपने पति से जब यह बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को यह काम करने के लिए स्वीकृति दे दी| श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी उसमें लगा दी| यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया|

श्वेता बताती हैं की – “उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे| मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए| मेरा सब कुछ छोड़कर बकरी पालन करने का यह फैसला बिल्कुल गलत है, और गांव में कुछ नहीं रखा है करने को|

हर नस्ल की बकरियां है फॉर्म में

अधिक से अधिक लोग पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहते हैं| कभी आपने यह सुना है की पढ़ाई करने के बाद किसी ने बकरी पालन करना चाहता है| पशुपालन व खेती से तो हमारे युवा वैसे ही दूर भागते हैं| ऐसे में यह बात तो मजाक ही लगेगी| लेकिन ऐसा हुआ है और समाज में इस बदलाव की कहानी को लिखा है श्वेता तोमर ने, श्वेता ने किसी छोटे नहीं बल्कि एनआईएफटी जैसे देश के सर्वश्रेष्ठ फैशन डिजाइनिंग इंस्टिट्यूट से पढ़ाई की है| और अब वह उत्तराखंड के अपने गांव में बकरी पालन कर रही हैं| श्वेता का सफर 2015 से शुरू होता है| जब वह शादी करके अपने पति के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हुई| वह पहले से एक सफल फैशन डिजाइनर थीं| बेंगलुरु आने के बाद वह घर पर खाली नहीं बैठना चाहती थी| बल्कि खुद का कोई काम शुरु करना चाहती थी| एक दिन श्वेता अपने पति के साथ एक बकरी का फॉर्म देखने गईं| वहां उन्होंने कुछ समय बिताया और उन्हें बहुत अच्छा लगा| वह खाली समय में अक्सर वहां जाने लगी| धीरे-धीरे फॉर्म में बकरी पालन की सारे नियम समझ लिए। श्वेता ने भी बकरी पालन करने का मन बना लिया था| एक गांव में जन्मी और पली-बढ़ी श्वेता को अच्छी तरह से पता था कि वह अपने इस शौक को इस शहर में नहीं पूरा कर सकती हैं| और इसलिए उन्होंने बेंगलुरु शहर की अपनी अच्छी-खासी लाइफस्टाइल को छोड़कर उत्तराखंड के देहरादून के पास रानी पोखरी जैसे छोटे से गांव में जाने का फैसला किया| उन्होंने अपने पति से जब यह बात बताई तो उन्होंने खुशी-खुशी श्वेता को यह काम करने के लिए स्वीकृति दे दी| श्वेता ने बकरी पालन शुरू करने के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी उसमें लगा दी| यहां तक बिजनेस को अच्छे स्तर तक पहुंचाने के लिए बैंक से लोन भी लिया| श्वेता बताती हैं की - "उनके नजदीकी लोग उनके इस फैसले से हैरान थे| मेरी पढ़ाई और डिग्री को देखकर हर कोई सोचता था कि मुझे किसी बड़ी कंपनी में जॉब करनी चाहिए और अच्छे पैसे कमाने चाहिए| मेरा सब कुछ छोड़कर बकरी पालन करने का यह फैसला बिल्कुल गलत है, और गांव में कुछ नहीं रखा है करने को| हर नस्ल की बकरियां है फॉर्म में श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था| वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था| जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे| लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरु कर दिया| इस समय श्वेता के फॉर्म में अलग-अलग प्रजातियों की सौ से  ज्यादा बकरियां पली है| इनमें सिरोही, बरबरी जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के 5 हजार से लेकर 1 लाख तक के बकरे मौजूद है| श्वेता बकरी पालन में पूरी तरह पारंगत हो चुके हैं| बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा मोटा इलाज सब वह खुद ही करती हैं| जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर पर लादकर मंडी ले जाती हैं| श्वेता के फॉर्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है| श्वेता बताती है शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का सहयोग मिलता रहा| पिछले साल का टर्नओवर 25 लाख रुपए का था| अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं|

देश के सर्वश्रेष्ठ इंस्टिट्यूट को छोड़ कर शुरू किया बकरी पालन, और अब कमाती है लाखों में

श्वेता ने अपना बिजनेस जिस जगह शुरू किया था| वहां बहुत से जंगली जानवरों के आने का खतरा भी रहता था| जो कभी भी बकरियों पर हमला कर सकते थे| लेकिन फिर भी श्वेता ने हार नहीं मानी और बैंक से लोन लेकर 250 बकरियों से बिजनेस शुरु कर दिया|

इस समय श्वेता के फॉर्म में अलग-अलग प्रजातियों की सौ से  ज्यादा बकरियां पली है| इनमें सिरोही, बरबरी जमना पारी और तोता पारी ब्रीड के 5 हजार से लेकर 1 लाख तक के बकरे मौजूद है|

श्वेता बकरी पालन में पूरी तरह पारंगत हो चुके हैं| बकरियों का दूध निकालने से लेकर उनकी देखभाल और छोटा मोटा इलाज सब वह खुद ही करती हैं| जरूरत पड़ने पर वह खुद ही बकरों को बिक्री के लिए लोडर पर लादकर मंडी ले जाती हैं| श्वेता के फॉर्म पर बकरियों की बिक्री इंटरनेट के माध्यम से भी होती है|

श्वेता बताती है शुरुआत में सरकारी स्तर पर छोटी मोटी कई दिक्कतें आईं पर पशुपालन विभाग का सहयोग मिलता रहा| पिछले साल का टर्नओवर 25 लाख रुपए का था| अब अपना व्यवसाय शुरू करने के बाद दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रशिक्षण भी देती हैं|

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