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जानिए गोबर से लाखों का कारोबार कैसे कर सकते है? गांव गुरु देगी आपको पूरी जानकारी –

Posted by Pramod on March 21, 2018
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जहां तक हम सब जानते हैं कि गोबर से खाद या बायोगैस बना सकते हैं| लेकिन क्या आप जानते हैं पिछले कुछ वर्षों में गोबर से बायो सीएनजी भी बनाया जाने लगा है यह बिल्कुल वैसे ही काम करती है जैसे कि आपके घर में एलपीजी गैस करती है लेकिन आपको जानकर खुशी मिलेगी कि यह LPG गैस से सस्ता पड़ता है और इससे पर्यावरण की भी बचत होती है|

बायो सीएनजी को बनाने के लिए भैंस गाय सहित दूसरे पशुओं के गोबर के अलावा सड़ी गली सब्जियों और फलों की आवश्यकता पड़ती है| यह प्लांट गोबर गैस के तर्ज पर ही काम करता है, लेकिन प्लांट से निकली गैस को बायो सीएनजी बनाने के लिए अलग से मशीनें लगाई जाती है|

मशीन को लगाने में थोड़ी लागत तो लगती है लेकिन यह आज के समय को देखते हुए बड़ा और कमाई देने वाला कारोबार है| पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र में ऐसे कई प्लांट चल रहे हैं लेकिन आपको जानकर खुशी मिलेगा कि अब उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक बड़ा व्यवसायिक प्लांट शुरू हो गया है|

उत्तर प्रदेश के जाने-माने शहर कानपुर में रहने वाले विशाल अग्रवाल हाईटेक मशीनों की मदद से बायो सीएनजी मना रहे हैं उनकी न सिर्फ CNG हाथो हाथ बिक जाती है बल्कि अपशिष्ट के तौर पर निकलने वाली स्लरी यानी बचा हुआ गोबर ताकतवर खाद का काम करता है| आसपास गांव के तमाम किसान इसे खरीद कर ले जाते हैं| इस प्लांट में शहर के कई फैक्ट्रियों, हॉस्टल में कम दामों पर इस गैस को उपलब्ध करा रहे हैं|
यह उत्तर प्रदेश का पहला व्यवसायिक बायोगैस प्लांट है तथा देश में ऐसे कई प्लांट चल रहे हैं|

जहां तक हम सब जानते हैं कि गोबर से खाद या बायोगैस बना सकते हैं| लेकिन क्या आप जानते हैं पिछले कुछ वर्षों में गोबर से बायो सीएनजी भी बनाया जाने लगा है यह बिल्कुल वैसे ही काम करती है जैसे कि आपके घर में एलपीजी गैस करती है लेकिन आपको जानकर खुशी मिलेगी कि यह LPG गैस से सस्ता पड़ता है और इससे पर्यावरण की भी बचत होती है| बायो सीएनजी को बनाने के लिए भैंस गाय सहित दूसरे पशुओं के गोबर के अलावा सड़ी गली सब्जियों और फलों की आवश्यकता पड़ती है| यह प्लांट गोबर गैस के तर्ज पर ही काम करता है, लेकिन प्लांट से निकली गैस को बायो सीएनजी बनाने के लिए अलग से मशीनें लगाई जाती है| मशीन को लगाने में थोड़ी लागत तो लगती है लेकिन यह आज के समय को देखते हुए बड़ा और कमाई देने वाला कारोबार है| पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र में ऐसे कई प्लांट चल रहे हैं लेकिन आपको जानकर खुशी मिलेगा कि अब उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक बड़ा व्यवसायिक प्लांट शुरू हो गया है| उत्तर प्रदेश के जाने-माने शहर कानपुर में रहने वाले विशाल अग्रवाल हाईटेक मशीनों की मदद से बायो सीएनजी मना रहे हैं उनकी न सिर्फ CNG हाथो हाथ बिक जाती है बल्कि अपशिष्ट के तौर पर निकलने वाली स्लरी यानी बचा हुआ गोबर ताकतवर खाद का काम करता है| आसपास गांव के तमाम किसान इसे खरीद कर ले जाते हैं| इस प्लांट में शहर के कई फैक्ट्रियों, हॉस्टल में कम दामों पर इस गैस को उपलब्ध करा रहे हैं| यह उत्तर प्रदेश का पहला व्यवसायिक बायोगैस प्लांट है तथा देश में ऐसे कई प्लांट चल रहे हैं| प्रायः शहरों में लगी बहुत सी डेयरिया है, जो गोबर को नाली में बहा देते थे| विशाल अग्रवाल बताते हैं कि – उन्हें पैसे देकर गोबर खरीद लेते हैं तथा शहर से जुड़े कई गांवों के लोग रोज गोबर हमारे प्लांट तक पहुंचा देते है| हमारे प्लांट की छमता प्रतिदिन 100 टन है पर अभी हमारे पास केवल 40-45 टन ही गोबर आ पाता है| 100 टन प्रतिदिन कैसे आए इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं| डेयरी और पोल्ट्री से कमाई करनी है तो इन 3 बातों का ध्यान रखें- कानपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर ससरौल ब्लॉक में लगभग पौने 2 एकड़ में 5000 घन मीटर का बायोगैस प्लांट लगा हुआ है| इस प्लांट में लगभग 30 से 35 गांव के लोग गोबर डालते हैं| प्लांट से तैयार हो रही बिजली के बारे में विशाल बताते हैं कि, ” वीवीएसए( वेरिएबल प्रेशर स्विंग एडसोरप्शन सिस्टम) टेक्नोलॉजी से हम गोबर को प्यूरीफाई कर लेते हैं और मेथेन बना लेते है मेथेन को कंप्रेस करके सेंटर में भर देते हैं हालांकि अभी विशाल को कुछ सरकारी कावायदों को पूरा करना है जिसके बाद उनका काम और रफ्तार पकड़ेगा|” विशाल आगे बताते हैं कि- अभी हमारे पास घर-घर LPG पहुंचाने का लाइसेंस नहीं है, इसलिए जहां कहीं भी व्यवसायिक LPG की मांग होती है वहां हम इसे बेच देते हैं| इस गैस को मार्केट रेट से कम दाम पर देते हैं इसलिए इसकी ज्यादा डिमांड है| विशाल के इस व्यवसायिक बायोगैस प्लांट में गैस बनाने में जितने भी मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है वह सभी इटली से मंगाई गई है इसके लिए उन्हें कोई भी सरकारी मदद नहीं मिली है| 3 साल लगे प्लांट को बनाने में – इस प्लांट को बनाने में करीब करीब 3 वर्ष का समय लगा| यह पिछले 1 वर्ष से ही शुरु हुआ है| प्लांट को लगाने के बारे में विशाल अग्रवाल बताते हैं कि ” 2013 में जब मैं पंजाब गया, तो वहां पर ऐसे कई प्लांट देखे थे| उसके बाद सोचा था कि ऐसा प्लांट में यूपी में भी तैयार करूंगा| वहां के किसान यूरिया और डीएपी के इस्तेमाल से परेशान है, तो उन्होंने ऐसे प्लांट लगाए हैं| लेकिन अभी यूपी में इस वेस्ट को बेचने में काफी परेशानी आ रही है|” किसान जैविक खेती को लेकर जागरूक नहीं – प्लांट में प्रतिदिन 50 टन का वेस्ट निकलता है| इसको बेचने के बारे में आ रही समस्याओं के बारे में विशाल बताते हैं, ” हमारे प्लांट से जो भी वेस्ट निकलता है उसको बेचने में काफी दिक्कत हो रही है, जबकि उसके वेस्ट को खेत में डालने के बाद रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नहीं पड़ेगी|

जानिए गोबर से लाखों का कारोबार कैसे कर सकते है? गांव गुरु देगी आपको पूरी जानकारी –

प्रायः शहरों में लगी बहुत सी डेयरिया है, जो गोबर को नाली में बहा देते थे| विशाल अग्रवाल बताते हैं कि  उन्हें पैसे देकर गोबर खरीद लेते हैं तथा शहर से जुड़े कई गांवों के लोग रोज गोबर हमारे प्लांट तक पहुंचा देते है| हमारे प्लांट की छमता प्रतिदिन 100 टन है पर अभी हमारे पास केवल 40-45 टन ही गोबर आ पाता है| 100 टन प्रतिदिन कैसे आए इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं|

डेयरी और पोल्ट्री से कमाई करनी है तो इन 3 बातों का ध्यान रखें-

कानपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर ससरौल ब्लॉक में लगभग पौने 2 एकड़ में 5000 घन मीटर का बायोगैस प्लांट लगा हुआ है| इस प्लांट में लगभग 30 से 35 गांव के लोग गोबर डालते हैं| प्लांट से तैयार हो रही बिजली के बारे में विशाल बताते हैं कि, ” वीवीएसए( वेरिएबल प्रेशर स्विंग एडसोरप्शन सिस्टम) टेक्नोलॉजी से हम गोबर को प्यूरीफाई कर लेते हैं और मेथेन बना लेते है मेथेन को कंप्रेस करके सेंटर में भर देते हैं हालांकि अभी विशाल को कुछ सरकारी कावायदों को पूरा करना है जिसके बाद उनका काम और रफ्तार पकड़ेगा|”

विशाल आगे बताते हैं कि- अभी हमारे पास घर-घर LPG पहुंचाने का लाइसेंस नहीं है, इसलिए जहां कहीं भी व्यवसायिक LPG की मांग होती है वहां हम इसे बेच देते हैं| इस गैस को मार्केट रेट से कम दाम पर देते हैं इसलिए इसकी ज्यादा डिमांड है|

विशाल के इस व्यवसायिक बायोगैस प्लांट में गैस बनाने में जितने भी मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है वह सभी इटली से मंगाई गई है इसके लिए उन्हें कोई भी सरकारी मदद नहीं मिली है|

3 साल लगे प्लांट को बनाने में –

इस प्लांट को बनाने में करीब करीब 3 वर्ष का समय लगा| यह पिछले 1 वर्ष से ही शुरु हुआ है| प्लांट को लगाने के बारे में विशाल अग्रवाल बताते हैं कि ” 2013 में जब मैं पंजाब गया, तो वहां पर ऐसे कई प्लांट देखे थे| उसके बाद सोचा था कि ऐसा प्लांट में यूपी में भी तैयार करूंगा| वहां के किसान यूरिया और डीएपी के इस्तेमाल से परेशान है, तो उन्होंने ऐसे प्लांट लगाए हैं| लेकिन अभी यूपी में इस वेस्ट को बेचने में काफी परेशानी आ रही है|”

किसान जैविक खेती को लेकर जागरूक नहीं –

प्लांट में प्रतिदिन 50 टन का वेस्ट निकलता है| इसको बेचने के बारे में आ रही समस्याओं के बारे में विशाल बताते हैं, ” हमारे प्लांट से जो भी वेस्ट निकलता है उसको बेचने में काफी दिक्कत हो रही है, जबकि उसके वेस्ट को खेत में डालने के बाद रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नहीं पड़ेगी|

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