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किसान भाई इसकी खेती करने से आप हो जाएंगे मालामाल – गांव गुरु

Posted by Pramod on April 11, 2018
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भारत में स्ट्राबेरी की खेती सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश से कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में 1960 के दशक से शुरू हुई| परंतु उपयुक्त किस्मों की अनुपलब्धता तथा तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती में अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी| आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में तकनीकी ज्ञान, परिवहन शीत भंडार और प्रसंस्करण व परिरक्षण की जानकारी होने से स्ट्रॉबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है| बहुउद्देशीय कंपनियों के आ जाने से स्ट्रॉबेरी के विशेष संसाधित पदार्थ जैसे जैम, पेय, कैंडी  इत्यादि बनाए जाने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है|

जलवायु:

भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती शीतोष्ण क्षेत्र में सफलता पूर्वक की जा सकती है| मैदानी क्षेत्रों में सिर्फ सर्दियों में ही इसकी एक फसल ली जा सकती है| पौधे अक्टूबर-नवंबर में लगाए जाते है, जिन्हें शीतोष्ण क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है| यहां फल फरवरी-मार्च में तैयार हो जाते हैं|

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र शिमला में किए गए शोध यह सिद्ध करते हैं कि दिसंबर से फरवरी माह तक स्ट्रॉबेरी की क्यारियां प्लास्टिक सीट से ढँक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं| और उपज भी 20% अधिक हो जाती है| अधिक वायु वेग वाले स्थान इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है| इन स्थानों पर वायु रोधक प्रावधान होना चाहिए|

भूमि का चुनाव तथा खेत की तैयारी:

इसकी खेती हल्की रेतीली से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है| परंतु दोमट मिट्टी इसके लिए विशेष उपयुक्त होती है| रेतीली भूमि में जहां पर्याप्त सिंचाई के साधन उपलब्ध हो, इसकी खेती की जा सकती है| अधिक लवण युक्त तथा अपर्याप्त जल निकास वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है|

हल चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है| सतह से 15 सेमी उठी हुई क्यारियों में इसकी खेती अच्छे ढंग से की जा सकती है| पहाड़ी ढलानों में सीढ़ी नुमा खेतो में क्यारियां 60 सेमी चौड़ी तथा खेत की लंबाई स्थिति अनुसार तैयार की जाती है|

सामान्यतया 150 सेमी लंबे तथा 60 सेमी चौड़ी क्यारी में 10 पौधे रोपे जाते हैं| खाद तथा उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार पर निर्भर है| ऐसी क्यारियों में अच्छी तरह गली-सड़ी 5-10 किलोग्राम गोबर की खाद और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण – कैन, सुपर फास्फेट और म्यूरेट आफ पोटाश 2:2:1 के अनुपात में देने की सिफारिश की जाती है| यह मिश्रण वर्ष में दो बार, मार्च तथा अगस्त माह में दिया जाता है| मैदानी क्षेत्र में इसकी खेती 60-75 सेमी चौड़ाई वाली लंबी क्यारियाँ बना कर, जिसमें 2 क्यारियाँ लगाई जा सके| या मेढ़े बनाकर उसी प्रकार की जा सकती है, जिस प्रकार टमाटर या अन्य सब्जियां उगाई जा सकती हैं|

पौधे लगाने की विधि:

भारत में स्ट्राबेरी की खेती सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश से कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में 1960 के दशक से शुरू हुई| परंतु उपयुक्त किस्मों की अनुपलब्धता तथा तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती में अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी | आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में तकनीकी ज्ञान, परिवहन शीत भंडार और प्रसंस्करण व परिरक्षण की जानकारी होने से स्ट्रॉबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है | बहुउद्देशीय कंपनियों के आ जाने से स्ट्रॉबेरी के विशेष संसाधित पदार्थ जैसे जैम, पेय, कैंडी  इत्यादि बनाए जाने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है| जलवायु: भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती शीतोष्ण क्षेत्र में सफलता पूर्वक की जा सकती है | मैदानी क्षेत्रों में सिर्फ सर्दियों में ही इसकी एक फसल ली जा सकती है | पौधे अक्टूबर-नवंबर में लगाए जाते है, जिन्हें शीतोष्ण क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है | यहां फल फरवरी-मार्च में तैयार हो जाते हैं भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र शिमला में किए गए शोध यह सिद्ध करते हैं कि दिसंबर से फरवरी माह तक स्ट्रॉबेरी की क्यारियां प्लास्टिक सीट से ढँक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं | और उपज भी 20% अधिक हो जाती है | अधिक वायु वेग वाले स्थान इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है | इन स्थानों पर वायु रोधक प्रावधान होना चाहिए | भूमि का चुनाव तथा खेत की तैयारी: इसकी खेती हल्की रेतीली से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है | परंतु दोमट मिट्टी इसके लिए विशेष उपयुक्त होती है | रेतीली भूमि में जहां पर्याप्त सिंचाई के साधन उपलब्ध हो, इसकी खेती की जा सकती है | अधिक लवण युक्त तथा अपर्याप्त जल निकास वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है | हल चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है | सतह से 15 सेमी उठी हुई क्यारियों में इसकी खेती अच्छे ढंग से की जा सकती है | पहाड़ी ढलानों में सीढ़ी नुमा खेतो में क्यारियां 60 सेमी चौड़ी तथा खेत की लंबाई स्थिति अनुसार तैयार की जाती है | सामान्यतया 150 सेमी लंबे तथा 60 सेमी चौड़ी क्यारी में 10 पौधे रोपे जाते हैं | खाद तथा उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार पर निर्भर है | ऐसी क्यारियों में अच्छी तरह गली-सड़ी 5-10 किलोग्राम गोबर की खाद और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण - कैन, सुपर फास्फेट और म्यूरेट आफ पोटाश 2:2:1 के अनुपात में देने की सिफारिश की जाती है | यह मिश्रण वर्ष में दो बार, मार्च तथा अगस्त माह में दिया जाता है | मैदानी क्षेत्र में इसकी खेती 60-75 सेमी चौड़ाई वाली लंबी क्यारियाँ बना कर, जिसमें 2 क्यारियाँ लगाई जा सके | या मेढ़े बनाकर उसी प्रकार की जा सकती है, जिस प्रकार टमाटर या अन्य सब्जियां उगाई जा सकती हैं | पौधे लगाने की विधि: पहाड़ी क्षेत्र में पौधे अगस्त-सितंबर तथा मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवंबर तक लगाए जाते हैं | पौधे किसी प्रमाणित व विश्वस्त नर्सरी से ही लिए जाने चाहिए | जिससे इसकी जाति की जानकारी मिले और रोग-रहित भी हो | पौधे लगाने से पहले पुराने पत्ते निकाल दिए जाने चाहिए | और एक दो नए उगने वाले पत्ते ही रखना चाहिए | मिट्टी से होने वाले रोगों से बचने के लिए पौधों की जड़ों को 1% बोर्डो मिश्रण या कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.2 %) या डाइथेन एम 45 (0.2 प्रतिशत) के घोल में 10 मिनट तक उपचारित करके छाया में हल्का सुखा लेना चाहिए | क्यारियों में कतार से कतार तथा पौधों से पौधे का अंतर 30 सेमी रखा जाता है | पौधा लगाने के समय क्यारियों में लगभग 15 सेमी गहरा छोटा गड्ढा बनाकर पौधा लगाकर उपचारित जड़ों के इर्द-गिर्द को अच्छी तरह दबा दिया जाता है | ताकि जड़ों तथा मिट्टी के बीच वायु ना रहे | पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई आवश्यक है | उन्नत किस्में: उन्नत किस्मों में मुख्य ट्योगा, टोरे, एन आर राउंड हैड, रैड कोट, कंटराई स्वीट आदि है, जो सामान्यतया छोटे आकार के फल देती हैं | इनमें अच्छा आकार टोरे तथा एन आर राउंड हैड का ही है | जिसके फल का वजन 4-5 ग्राम होता है| आजकल बड़े आकार वाली जातियां देश में आयात की जा रही हैं | जिनमें चाँडलर कनफ्यूचरा, डागलस, गारौला, पजारों, फर्न, ऐडी, सैलवा, ब्राईटन, बेलरूबी, दाना तथा ईटना आदि प्रमुख है । स्ट्रॉबेरी की उपज इसकी जाति और जलवायु पर निर्भर करती है सम्मानित है | सामान्यतया इसके उपज 200-500 ग्राम प्रति पौधा मिल जाती है | यद्यपि विदेशों में अधिकतम 900-1000 ग्राम प्रति पौधा ली जा चुकी है | सिंचाई और देखभाल: स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़े गहरी होती हैं, इसलिए जड़ों के निकट नमी की कमी से पौधों को क्षति हो सकती है | और पौधे मर भी सकते हैं | सिंचाई की थोड़ी सी कमी से भी फलों के आकार और गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है | स्ट्रॉबेरी की फसल को बार-बार परंतु हल्की सिंचाई चाहिए | सामान्य परिस्थितियों में शरद ऋतु में 10-15 दिन तथा ग्रीष्म में 5-7 दिन के अंतराल में सिंचाई आवश्यक है | ड्रिप (बूंद-बूंद) सिंचाई विधि विशेष लाभप्रद है | सिंचाई की मात्रा मिट्टी की अवस्था तथा खेत कि ढलानों पर निर्भर रहती है | स्ट्रॉबेरी की क्यारियों को सूखी घास या काले रंग की प्लास्टिक की चादर से ढकने के विशेष लाभ है | सूखी घास की मोटाई 5-7 सेमी आवश्यक है | विभिन्न अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित किया गया है कि इस विधि द्वारा मिट्टी में अच्छी नमी रहती है | खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं | पाले के कुप्रभावों को भी कम करती है | और फलों का सड़ना कम हो जाता है | पकने वाले फलों को सुखी घास से ढँकने से पक्षियों द्वारा नुकसान भी कम होता है | ओलावृष्टि प्रभावित क्षेत्रों में क्यारी के ऊपर ओलारोधक जालों का प्रयोग किया जा सकता है | जिस पौधे से फल लेने हो उनमें से रन्नज काट देना चाहिए | अन्यथा भरपूर फसल नहीं भी आ सकती है | और फलों का आकार भी छोटा रह जाता है | जिसका प्रभाव विक्रय मूल्य पर पड़ता है स्ट्रॉबेरी का पौधा पहले वर्ष से ही फल देने लग जाता है | शीतोष्ण क्षेत्र में एक पौधे की लाभप्रद फसल 3 वर्ष तक ली जा सकती है | परंतु सबसे अधिक उपज 2 वर्ष की आयु का पौधा देता है | कृषक अपने खेतों में स्ट्रॉबेरी इस क्रम में लगाएं ताकि अधिक से अधिक क्यारियाँ 2 या 3 वर्ष की आयु के पौधों की हो, और 3 वर्ष से अधिक आयु वाली क्यारियों में पुनः पौधारोपण कर दे | कीट व रोग नियंत्रण: स्ट्रॉबेरी की खेती को कई कीट व रोग क्षति पहुंचाते हैं | कीटो में तेला, माइट, कटवर्म तथा सूत्रकृमि प्रमुख है | डीमैथोयेट, डिमैटोन, फौरेट का प्रयोग इन्हें नियंत्रण में रखता है | फलों पर भूरा फफूंद रोग तथा पत्तों पर धब्बों वाले रोगों का नियंत्रण डायाथयोकार्बामेट पर आधारित फफूंदनाशक रसायनों के छिड़काव से किया जा सकता है | फल लग जाने के बाद किसी भी फफूंद व कीटनाशक रसायनों का छिड़काव नहीं करना चाहिए | यदि किन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों में करना भी पड़े तो छिड़काव विशेष सावधानी से किया जाना चाहिए | 3 वर्ष तक स्ट्रॉबेरी की खेती करने के बाद खेत को कम से कम 1 वर्ष तक खाली रखने या गेहूं, सरसों, मक्का, तथा दलहन फसलों का चक्र अपनाने से कीट सूत्रकृमि तथा अन्य रोगों का प्रकोप कम हो जाता है | तुड़ाई: मार्च से मई तथा मैदानी क्षेत्रों में फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च माह तक फल पकने शुरू हो जाते हैं | पकने के समय फलों का रंग हरे से लाल रंग में बदलना शुरू हो जाता है | फल का आधे से अधिक भाग का लाल रंग होना, तुड़ाई की उचित समय को बताता है | फलों की तुड़ाई विशेष सावधानी तथा कम गहरी टोकरियों से ही करनी चाहिए | रोगी व छतिग्रस्त फलों की छँटनी अवश्य करनी चाहिए | फल तोड़ने के तुरंत बाद 2 घंटे शीत भंडारण करने से फलों की भंडारण अवधि बढ़ जाती है |

पहाड़ी क्षेत्र में पौधे अगस्त-सितंबर तथा मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवंबर तक लगाए जाते हैं| पौधे किसी प्रमाणित व विश्वस्त नर्सरी से ही लिए जाने चाहिए| जिससे इसकी जाति की जानकारी मिले और रोग-रहित भी हो| पौधे लगाने से पहले पुराने पत्ते निकाल दिए जाने चाहिए| और एक दो नए उगने वाले पत्ते ही रखना चाहिए|

मिट्टी से होने वाले रोगों से बचने के लिए पौधों की जड़ों को 1% बोर्डो मिश्रण या कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.2 %) या डाइथेन एम 45 (0.2 प्रतिशत) के घोल में 10 मिनट तक उपचारित करके छाया में हल्का सुखा लेना चाहिए| क्यारियों में कतार से कतार तथा पौधों से पौधे का अंतर 30 सेमी रखा जाता है|

पौधा लगाने के समय क्यारियों में लगभग 15 सेमी गहरा छोटा गड्ढा बनाकर पौधा लगाकर उपचारित जड़ों के इर्द-गिर्द को अच्छी तरह दबा दिया जाता है| ताकि जड़ों तथा मिट्टी के बीच वायु ना रहे| पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई आवश्यक है|

उन्नत किस्में:

उन्नत किस्मों में मुख्य ट्योगा, टोरे, एन आर राउंड हैड, रैड कोट, कंटराई स्वीट आदि है, जो सामान्यतया छोटे आकार के फल देती हैं| इनमें अच्छा आकार टोरे तथा एन आर राउंड हैड का ही है| जिसके फल का वजन 4-5 ग्राम होता है| आजकल बड़े आकार वाली जातियां देश में आयात की जा रही हैं| जिनमें चाँडलर कनफ्यूचरा, डागलस, गारौला, पजारों, फर्न, ऐडी, सैलवा, ब्राईटन, बेलरूबी, दाना तथा ईटना आदि प्रमुख है।

स्ट्रॉबेरी की उपज इसकी जाति और जलवायु पर निर्भर करती है सम्मानित है| सामान्यतया इसके उपज 200-500 ग्राम प्रति पौधा मिल जाती है| यद्यपि विदेशों में अधिकतम 900-1000 ग्राम प्रति पौधा ली जा चुकी है|

सिंचाई और देखभाल:

स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़े गहरी होती हैं, इसलिए जड़ों के निकट नमी की कमी से पौधों को क्षति हो सकती है| और पौधे मर भी सकते हैं| सिंचाई की थोड़ी सी कमी से भी फलों के आकार और गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है|

स्ट्रॉबेरी की फसल को बार-बार परंतु हल्की सिंचाई चाहिए| सामान्य परिस्थितियों में शरद ऋतु में 10-15 दिन तथा ग्रीष्म में 5-7 दिन के अंतराल में सिंचाई आवश्यक है| ड्रिप (बूंद-बूंद) सिंचाई विधि विशेष लाभप्रद है| सिंचाई की मात्रा मिट्टी की अवस्था तथा खेत कि ढलानों पर निर्भर रहती है|

स्ट्रॉबेरी की क्यारियों को सूखी घास या काले रंग की प्लास्टिक की चादर से ढकने के विशेष लाभ है| सूखी घास की मोटाई 5-7 सेमी आवश्यक है| विभिन्न अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित किया गया है कि इस विधि द्वारा मिट्टी में अच्छी नमी रहती है| खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं| पाले के कुप्रभावों को भी कम करती है| और फलों का सड़ना कम हो जाता है| पकने वाले फलों को सुखी घास से ढँकने से पक्षियों द्वारा नुकसान भी कम होता है|

ओलावृष्टि प्रभावित क्षेत्रों में क्यारी के ऊपर ओलारोधक जालों का प्रयोग किया जा सकता है| जिस पौधे से फल लेने हो उनमें से रन्नज काट देना चाहिए| अन्यथा भरपूर फसल नहीं भी आ सकती है| और फलों का आकार भी छोटा रह जाता है| जिसका प्रभाव विक्रय मूल्य पर पड़ता है स्ट्रॉबेरी का पौधा पहले वर्ष से ही फल देने लग जाता है|

शीतोष्ण क्षेत्र में एक पौधे की लाभप्रद फसल 3 वर्ष तक ली जा सकती है | परंतु सबसे अधिक उपज 2 वर्ष की आयु का पौधा देता है | कृषक अपने खेतों में स्ट्रॉबेरी इस क्रम में लगाएं ताकि अधिक से अधिक क्यारियाँ 2 या 3 वर्ष की आयु के पौधों की हो, और 3 वर्ष से अधिक आयु वाली क्यारियों में पुनः पौधारोपण कर दे |

भारत में स्ट्राबेरी की खेती सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश से कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में 1960 के दशक से शुरू हुई| परंतु उपयुक्त किस्मों की अनुपलब्धता तथा तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती में अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी | आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में तकनीकी ज्ञान, परिवहन शीत भंडार और प्रसंस्करण व परिरक्षण की जानकारी होने से स्ट्रॉबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है | बहुउद्देशीय कंपनियों के आ जाने से स्ट्रॉबेरी के विशेष संसाधित पदार्थ जैसे जैम, पेय, कैंडी  इत्यादि बनाए जाने के लिए प्रोत्साहन मिल रहा है| जलवायु: भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती शीतोष्ण क्षेत्र में सफलता पूर्वक की जा सकती है | मैदानी क्षेत्रों में सिर्फ सर्दियों में ही इसकी एक फसल ली जा सकती है | पौधे अक्टूबर-नवंबर में लगाए जाते है, जिन्हें शीतोष्ण क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है | यहां फल फरवरी-मार्च में तैयार हो जाते हैं भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र शिमला में किए गए शोध यह सिद्ध करते हैं कि दिसंबर से फरवरी माह तक स्ट्रॉबेरी की क्यारियां प्लास्टिक सीट से ढँक देने से फल एक माह पहले तैयार हो जाते हैं | और उपज भी 20% अधिक हो जाती है | अधिक वायु वेग वाले स्थान इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है | इन स्थानों पर वायु रोधक प्रावधान होना चाहिए | भूमि का चुनाव तथा खेत की तैयारी: इसकी खेती हल्की रेतीली से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है | परंतु दोमट मिट्टी इसके लिए विशेष उपयुक्त होती है | रेतीली भूमि में जहां पर्याप्त सिंचाई के साधन उपलब्ध हो, इसकी खेती की जा सकती है | अधिक लवण युक्त तथा अपर्याप्त जल निकास वाली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है | हल चलाकर मिट्टी भुरभुरी बना ली जाती है | सतह से 15 सेमी उठी हुई क्यारियों में इसकी खेती अच्छे ढंग से की जा सकती है | पहाड़ी ढलानों में सीढ़ी नुमा खेतो में क्यारियां 60 सेमी चौड़ी तथा खेत की लंबाई स्थिति अनुसार तैयार की जाती है | सामान्यतया 150 सेमी लंबे तथा 60 सेमी चौड़ी क्यारी में 10 पौधे रोपे जाते हैं | खाद तथा उर्वरकों की मात्रा मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार पर निर्भर है | ऐसी क्यारियों में अच्छी तरह गली-सड़ी 5-10 किलोग्राम गोबर की खाद और 50 ग्राम उर्वरक मिश्रण - कैन, सुपर फास्फेट और म्यूरेट आफ पोटाश 2:2:1 के अनुपात में देने की सिफारिश की जाती है | यह मिश्रण वर्ष में दो बार, मार्च तथा अगस्त माह में दिया जाता है | मैदानी क्षेत्र में इसकी खेती 60-75 सेमी चौड़ाई वाली लंबी क्यारियाँ बना कर, जिसमें 2 क्यारियाँ लगाई जा सके | या मेढ़े बनाकर उसी प्रकार की जा सकती है, जिस प्रकार टमाटर या अन्य सब्जियां उगाई जा सकती हैं | पौधे लगाने की विधि: पहाड़ी क्षेत्र में पौधे अगस्त-सितंबर तथा मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवंबर तक लगाए जाते हैं | पौधे किसी प्रमाणित व विश्वस्त नर्सरी से ही लिए जाने चाहिए | जिससे इसकी जाति की जानकारी मिले और रोग-रहित भी हो | पौधे लगाने से पहले पुराने पत्ते निकाल दिए जाने चाहिए | और एक दो नए उगने वाले पत्ते ही रखना चाहिए | मिट्टी से होने वाले रोगों से बचने के लिए पौधों की जड़ों को 1% बोर्डो मिश्रण या कॉपर आक्सीक्लोराइड (0.2 %) या डाइथेन एम 45 (0.2 प्रतिशत) के घोल में 10 मिनट तक उपचारित करके छाया में हल्का सुखा लेना चाहिए | क्यारियों में कतार से कतार तथा पौधों से पौधे का अंतर 30 सेमी रखा जाता है | पौधा लगाने के समय क्यारियों में लगभग 15 सेमी गहरा छोटा गड्ढा बनाकर पौधा लगाकर उपचारित जड़ों के इर्द-गिर्द को अच्छी तरह दबा दिया जाता है | ताकि जड़ों तथा मिट्टी के बीच वायु ना रहे | पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई आवश्यक है | उन्नत किस्में: उन्नत किस्मों में मुख्य ट्योगा, टोरे, एन आर राउंड हैड, रैड कोट, कंटराई स्वीट आदि है, जो सामान्यतया छोटे आकार के फल देती हैं | इनमें अच्छा आकार टोरे तथा एन आर राउंड हैड का ही है | जिसके फल का वजन 4-5 ग्राम होता है| आजकल बड़े आकार वाली जातियां देश में आयात की जा रही हैं | जिनमें चाँडलर कनफ्यूचरा, डागलस, गारौला, पजारों, फर्न, ऐडी, सैलवा, ब्राईटन, बेलरूबी, दाना तथा ईटना आदि प्रमुख है । स्ट्रॉबेरी की उपज इसकी जाति और जलवायु पर निर्भर करती है सम्मानित है | सामान्यतया इसके उपज 200-500 ग्राम प्रति पौधा मिल जाती है | यद्यपि विदेशों में अधिकतम 900-1000 ग्राम प्रति पौधा ली जा चुकी है | सिंचाई और देखभाल: स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़े गहरी होती हैं, इसलिए जड़ों के निकट नमी की कमी से पौधों को क्षति हो सकती है | और पौधे मर भी सकते हैं | सिंचाई की थोड़ी सी कमी से भी फलों के आकार और गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है | स्ट्रॉबेरी की फसल को बार-बार परंतु हल्की सिंचाई चाहिए | सामान्य परिस्थितियों में शरद ऋतु में 10-15 दिन तथा ग्रीष्म में 5-7 दिन के अंतराल में सिंचाई आवश्यक है | ड्रिप (बूंद-बूंद) सिंचाई विधि विशेष लाभप्रद है | सिंचाई की मात्रा मिट्टी की अवस्था तथा खेत कि ढलानों पर निर्भर रहती है | स्ट्रॉबेरी की क्यारियों को सूखी घास या काले रंग की प्लास्टिक की चादर से ढकने के विशेष लाभ है | सूखी घास की मोटाई 5-7 सेमी आवश्यक है | विभिन्न अनुसंधानों द्वारा यह प्रमाणित किया गया है कि इस विधि द्वारा मिट्टी में अच्छी नमी रहती है | खरपतवार भी नियंत्रित रहते हैं | पाले के कुप्रभावों को भी कम करती है | और फलों का सड़ना कम हो जाता है | पकने वाले फलों को सुखी घास से ढँकने से पक्षियों द्वारा नुकसान भी कम होता है | ओलावृष्टि प्रभावित क्षेत्रों में क्यारी के ऊपर ओलारोधक जालों का प्रयोग किया जा सकता है | जिस पौधे से फल लेने हो उनमें से रन्नज काट देना चाहिए | अन्यथा भरपूर फसल नहीं भी आ सकती है | और फलों का आकार भी छोटा रह जाता है | जिसका प्रभाव विक्रय मूल्य पर पड़ता है स्ट्रॉबेरी का पौधा पहले वर्ष से ही फल देने लग जाता है | शीतोष्ण क्षेत्र में एक पौधे की लाभप्रद फसल 3 वर्ष तक ली जा सकती है | परंतु सबसे अधिक उपज 2 वर्ष की आयु का पौधा देता है | कृषक अपने खेतों में स्ट्रॉबेरी इस क्रम में लगाएं ताकि अधिक से अधिक क्यारियाँ 2 या 3 वर्ष की आयु के पौधों की हो, और 3 वर्ष से अधिक आयु वाली क्यारियों में पुनः पौधारोपण कर दे | कीट व रोग नियंत्रण: स्ट्रॉबेरी की खेती को कई कीट व रोग क्षति पहुंचाते हैं | कीटो में तेला, माइट, कटवर्म तथा सूत्रकृमि प्रमुख है | डीमैथोयेट, डिमैटोन, फौरेट का प्रयोग इन्हें नियंत्रण में रखता है | फलों पर भूरा फफूंद रोग तथा पत्तों पर धब्बों वाले रोगों का नियंत्रण डायाथयोकार्बामेट पर आधारित फफूंदनाशक रसायनों के छिड़काव से किया जा सकता है | फल लग जाने के बाद किसी भी फफूंद व कीटनाशक रसायनों का छिड़काव नहीं करना चाहिए | यदि किन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों में करना भी पड़े तो छिड़काव विशेष सावधानी से किया जाना चाहिए | 3 वर्ष तक स्ट्रॉबेरी की खेती करने के बाद खेत को कम से कम 1 वर्ष तक खाली रखने या गेहूं, सरसों, मक्का, तथा दलहन फसलों का चक्र अपनाने से कीट सूत्रकृमि तथा अन्य रोगों का प्रकोप कम हो जाता है | तुड़ाई: मार्च से मई तथा मैदानी क्षेत्रों में फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च माह तक फल पकने शुरू हो जाते हैं | पकने के समय फलों का रंग हरे से लाल रंग में बदलना शुरू हो जाता है | फल का आधे से अधिक भाग का लाल रंग होना, तुड़ाई की उचित समय को बताता है | फलों की तुड़ाई विशेष सावधानी तथा कम गहरी टोकरियों से ही करनी चाहिए | रोगी व छतिग्रस्त फलों की छँटनी अवश्य करनी चाहिए | फल तोड़ने के तुरंत बाद 2 घंटे शीत भंडारण करने से फलों की भंडारण अवधि बढ़ जाती है |
कीट व रोग नियंत्रण:

स्ट्रॉबेरी की खेती को कई कीट व रोग क्षति पहुंचाते हैं| कीटो में तेला, माइट, कटवर्म तथा सूत्रकृमि प्रमुख है| डीमैथोयेट, डिमैटोन, फौरेट का प्रयोग इन्हें नियंत्रण में रखता है| फलों पर भूरा फफूंद रोग तथा पत्तों पर धब्बों वाले रोगों का नियंत्रण डायाथयोकार्बामेट पर आधारित फफूंदनाशक रसायनों के छिड़काव से किया जा सकता है|

फल लग जाने के बाद किसी भी फफूंद व कीटनाशक रसायनों का छिड़काव नहीं करना चाहिए| यदि किन्हीं आपातकालीन परिस्थितियों में करना भी पड़े तो छिड़काव विशेष सावधानी से किया जाना चाहिए| 3 वर्ष तक स्ट्रॉबेरी की खेती करने के बाद खेत को कम से कम 1 वर्ष तक खाली रखने या गेहूं, सरसों, मक्का, तथा दलहन फसलों का चक्र अपनाने से कीट सूत्रकृमि तथा अन्य रोगों का प्रकोप कम हो जाता है|

तुड़ाई:

मार्च से मई तथा मैदानी क्षेत्रों में फरवरी के आखिरी सप्ताह से मार्च माह तक फल पकने शुरू हो जाते हैं| पकने के समय फलों का रंग हरे से लाल रंग में बदलना शुरू हो जाता है| फल का आधे से अधिक भाग का लाल रंग होना, तुड़ाई की उचित समय को बताता है| फलों की तुड़ाई विशेष सावधानी तथा कम गहरी टोकरियों से ही करनी चाहिए| रोगी व छतिग्रस्त फलों की छँटनी अवश्य करनी चाहिए| फल तोड़ने के तुरंत बाद 2 घंटे शीत भंडारण करने से फलों की भंडारण अवधि बढ़ जाती है|

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