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हाइड्रोजेल बदल सकता है किसानों की किस्मत, अब किसान कम पानी में भी कर सकते हैं खेती – गांव गुरु

जिस तरह देश में जल संकट बढ़ रहा है| जिसके कारण कई राज्यों की खेती सूखे से पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है|  अगर ऐसा ही रहा तो कुछ साल में खेती नहीं हो पाएगी, ऐसे में हाइड्रोजन जेल की मदद से कम पानी में भी खेती कर सकते हैं|

भारत में जितनी खेती होती है उनमें से 60% खेती ऐसे क्षेत्र में की जाती है जहां पानी की बहुत किल्लत होती है| इनमें से 30% जगह पर पर्याप्त बारिश नहीं होती है| भारत में खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है| देश में 60 % खेती बारिश के पानी पर निर्भर है| और इन क्षेत्र में वार्षिक वर्षा 1150 मीटर से भी कम होती है|

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजल विकसित किया है| जिसकी मदद से बारिश के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है| और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी|

हाइड्रोजेल विकसित करने में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरल रेजिन एंड गम ने एक नई उपलब्धि हासिल की है| आईआईएनआरजी, भारतीय प्राकृतिक रेजिन और गम्स संस्थान के वैज्ञानिकों ने ग्वार फली से हाइड्रोजेल विकसित किया है| जो पूरी तरह से प्राकृतिक है| हाइड्रोजेल पॉलिमर है| जिसमें पानी को सोख लेने की क्षमता होती है| और यह पानी में घुलता भी नहीं है| हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल भी होता है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहता है।

आईआईएनआरजी के वैज्ञानिक डॉक्टर नंदकिशोर थोंबरे बताते हैं – “हाइड्रोजेल से खेत की उर्वरा शक्ति पर भी कोई असर नहीं पड़ता है| यह अपनी क्षमता से कई गुना अधिक पानी सोख लेता है| एक एकड़ खेत में 1-2 किलो हाइड्रोजल की जरूरत होती है| हाइड्रोजल 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है| इसलिए इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है जहां सूखा पड़ता है|”

हाइड्रोजेल बदल सकता है किसानों की किस्मत, अब किसान कम पानी में भी कर सकते हैं खेती - गांव गुरु

हाइड्रोजेल

हाइड्रोजेल के कण बारिश होने पर या सिचाई के वक्त खेत में जाने वाले पानी को सोख लेता है| और जब बारिश नहीं होती है तो कण से खुद-ब-खुद पानी रिसता है| जिससे फसलों को पानी मिल जाता है| फिर अगर बारिश हो तो हाइड्रोजेल दोबारा पानी को सोख लेता है| और जरूरत के अनुसार फिर उसमें से पानी का रिसाव होने लगता है|

खेतों में हाइड्रोजेल का एक बार इस्तेमाल किया जाए तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है| और इसके बाद ही वह नष्ट होता है लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है| बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुंचाता है|

हाइड्रोजेल का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है| जब फसलें बोई जाती हैं| फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं| भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने मक्का, गेहूं, आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर, फूल-गोभी, गाजर, धान, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया गया है| इससे कृषि उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है|

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